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आईना गवाह है…

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Hindi Poetry

आईना गवाह है

क्यों हो गयी तुम मौन सहसा,

क्यों रोक ली मीठी मुस्कान,

समझ लिया क्यों उसको सौतन,

कि तुम अभी कुंआरी हो ।

 

क्यों जल रही हो,

उस उजले सौन्दर्य पर,

वो तुम ही तो हो ,

उस आईने के अन्दर ।

 

अल्हड़पन की नादानी में,

खुद से ही झगड़ा,

ये कौन सा बहाव है,

जरा मुस्कुराकर पूछो तो आईने से,

कि आईना गवाह है । 

 

***** हरीश चन्द्र लोहुमी

6 Comments

  1. Vishvnand says:

    अच्छी रचना, अच्छा अंदाज़
    पर ऐसा हो सकता है क्या किसीका मिजाज़
    कि खुद के आईने से जलने लगे किसीका शबाब … 🙂

  2. siddha nath singh says:

    sundar अंदाज़.

  3. dr.ved vyathit says:

    सुंदर अंदाज की रचना भुत २ बधाई

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