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भीड़

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Hindi Poetry

भीड़ पर एक गोली चले तो भीड़ ख़त्म नहीं होती
आदमी पर चल जाए – आदमी ख़त्म हो जाता है.

इसलिए मैं कहता हूँ अपने मित्रों से –
कि कोशिश करो कि भीड़ का हिस्सा हो सको.
इसलिए मैं कहता हूँ अपने परिचितों और शुभचिंतकों से –
कि अपनी पहचान की कीमत बहुत ज्यादा है.
इसलिए मैं सिखाऊँगा अपने बच्चे को –
कि भीड़ बनना, आदमी नहीं!

भीड़ ना तो बुरा देखती है, ना सुनती है
और कहने का तो सवाल ही नहीं उठता.
एक अच्छी भीड़ हमेशा चुप रहती है.

इसलिए समझाऊँगा चुप रहने की कीमत.
बच्चा शायद मेरी बात न माने –
सो, मैं उसे गांधी की कहानियां बतलाऊँगा.
और चुपके से भर दूंगा उसके अंतस में –
‘बुरा न देखो, बुरा न सुनो, बुरा न कहो’ का मंत्र.

4 Comments

  1. sushil sarna says:

    nice poetry with a deep sence of mob and man-congr8s

  2. rajiv srivastava says:

    bheed ka hissa banane se khud ki pehchaan mit jati hai .phir bhi aaj bheed (ek jut) ho kar hum har badha par kar sakte hai.AAchi rachna hai–with deep thought–badahai

  3. dp says:

    appriciable …

  4. Vishvnand says:

    अलग अंदाज़ की गहन वैचारिक और भावनिक रचना .
    बड़ी मनभावन और विचारों को चालना देनेवाली
    बहुत प्रशंसनीय और अति सुन्दर
    रचना के लिए हार्दिक अभिनन्दन

    महात्मा गांधी की कहानियां बच्चों को जरूर सुनवाइये
    पर आज के माहौल में गाँधी क्या महात्मा बन पाते,
    आज के जो बेकार गांधी हैं उनके उपदेश को क्यूँ भीड़ में मान देते … .

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