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जब…

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Crowned Poem, Hindi Poetry

कवितायें जब नहीं फूटती –
शब्द जब साथ नहीं देते –
विचारों की तरतीब जब ख़तम हो जाती है –
भावों की जमीन बंजर पड़ जाती है –
भूत का बोझ जब भविष्य के कन्धों पे बैठ जाता है –
भविष्य का अँधियारा जब वर्तमान पे छाता है –
जब अन्दर का निर्जीव थोडा कुलबुलाता है –
– तुम्हारा ‘न होना’ याद आता है

9 Comments

  1. Harish Chandra Lohumi says:

    बहुत अच्छे विकास जी ! बधाई !!!

    जब कोई …
    अपना सा बन
    एहसास सा दिलाता है
    सजीव से बने रहने का –
    इस निर्जीविता में भी ,
    – तुम्हारा “होना” याद आता है .

  2. neeraj guru says:

    क्या कहूँ…..एक झंझावत की तरह कविता है अपनी पूर्ण लय-ताल में और अंत में वही चिर परिचित अंदाज़,विकाश का.

  3. prachi sandeep singla says:

    itz brilliant 🙂

  4. Prem Kumar Shriwastav says:

    वाकई …….शायद कुछ न कह पाऊ…

  5. dp says:

    Liked it . unmatched ..

  6. sushil sarna says:

    चन्द शब्दों में अद्वितीय रचना-बधाई

  7. pallawi says:

    speechless !!

  8. Vishvnand says:

    वाह वाह, बहुत खूब क्या बात है
    पढ़कर दिल नाच उठा

    “जब अन्दर का निर्जीव थोडा कुलबुलाता है –
    – तुम्हारा ‘न होना’ याद आता है
    कवितायें जब नहीं फूटती –
    शब्द जब साथ नहीं देते -”
    फिर भी जब कुछ लिखता हूँ
    ऐसी उत्कृष्ट रचना जन्म ले लेती है ….

    इस रचना के लिए हार्दिक अभिनन्दन

  9. ashwini kumar goswami says:

    बहुत सुन्दर, भावात्मक एवं संतुलित लेखन ! बधाई ! कृपया ऐसी रचनाएं निरंतर
    लिखते जाओ और इस मंच को उज्ज्वलतर करते रहो !

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