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गुरु-शिष्य परंपरा(एकलव्य – द्रोणाचार्य) !

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Hindi Poetry

अपने हाथो से अपना अँगूठा

काट कर अपने गुरु के चरणो

मे रख देने वाले हे”एकलव्य”

तुम गुरु- शिष्य परंपरा की मिसाल हो!

आज भी जब कभी इस परंपरा

पर चर्चा होती है,तो तुम्हारा ही

नाम सर्वप्रथम लिया जाता है!

कैसा अहसास हुआ होगा तुम्हे

जब तुम्हारी शिष्य बनने की

प्रार्थना गुरु द्रोणाचार्य ने ठुकरा दी थी,

क्या एक पल के लिए भी तुम्हे इस

अन्याय के प्रति कुंठा नही हुई थी!

और कैसा अहसास हुआ होगा गुरु

द्रोणाचार्य को जब उन्होने अपने

प्रिय शिष्य अर्जुन की खातिर

तुम्हारा प्रस्ताव ठुकराया था

यक़ीनन उन्हे भी अफ़सोस हुआ होगा!

बड़ा फक्र हुआ होगा गुरु द्रोणाचार्य

को तुम पर जब शवान मुख मे कई

तीर प्रविष्ट कर मौन कर दिया था उसे,

उस दिन उन्हे अपने फ़ैसले पर

शर्मिंदगी हुई होगी और मन ही मन

असीमित आशीष दिए होंगे तुम्हे!

और फिर जब तुम्हारा अँगूठा माँगा था

उन्होने, वो पल समस्त ब्राम्‍हांड के लिए

एक दुर्भाग्यपूर्ण छण रहा होगा और

जब अगले ही पल तुमने

अपना अंगूठा काट गुरु के

कदमो मे रख दिया था,और

लहू की बूंदे धरा पर गिर रही थी

तुम्हारी रक्त की बूँदो से धरती

भी धन्य हुई होगी और ऋणी

हो गयी होगी तुम्हारी!

उस एक पल ने गुरु द्रोणाचर्या

की छवि को धूमिल किया था,

गुरु-शिष्य के रिश्ते पर सवालिया

निशान लगा दिया था!और तुम्हने

अपना सब कुछ खो कर के भी,

युगो-युगो के लिए जो ख्याति प्राप्त की है,

वो शायद अर्जुन ने सारी उम्र अपनी

धनुष विद्या का कौशल दिखा कर के

भी प्राप्त नही की है,

आज जब भी गुरु शिष्या

परंपरा की बात होती है तो

गुरु द्रोणाचार्य के साथ अर्जुन का

नही तुम्हारा ही नाम लिया जाता है,

धन्य है एकलव्य तुमाहरी गुरु -भक्ति

और गुरु दक्षिणा !


गुरु शिष्य के काम

से पहचाना जाए इससे अधिक सुखद

अहसास किसी गुरु के लिए नही

हो सकता!धन्य है वो गुरु जिन्हे

एकलव्य जैसा शिष्य मिलता है!

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

7 Comments

  1. Vishvnand says:

    beautiful nicely flowing meaningful poem.
    liked immensely.
    commends

    (some words wrongly printed need correction)

  2. Harish Chandra Lohumi says:

    वाह सर! गज़ब की रचना । गुरु द्रोण भले ही तब न पछताये हों यदि इस रचना को पढ़ते तो अवश्य पछताते !

    बधाई !!!

  3. rajiv srivastava says:

    Aap ka comment pad kar mujhe hansi aa gayi .aur soch soch kar main kafi der tak hansta raha—you made my evening, waise mera aisa koi intention nahi tha-

    • Harish Chandra Lohumi says:

      @rajiv srivastava, मैं तो और भी बहुत कुछ लिखने वाला था । यह सोचकर नहीं लिखा कहीं हँसी रुकी ही नहीं तो !! :) :) :)

  4. g p johri says:

    aap ki eas rachna nay mera man moh liya ,bacpan say jo mery vicharo ko smarthn mila dhanwad
    9060590200

  5. Avtar says:

    श्रीवास्तव जी आपने एकलव्य की पीड़ा को ठीक से समझा धन्यवाद्

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