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Kashmakash

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Hindi Poetry, Nov 2010 Contest

कद् मकद्गा – बेटी जनने की

सबेरा गुनगुनाता और रात दीवाली मनाती थी,
खुद्गिायाँ पंख पसारे मेरी किस्मत पर इतराती थी
फिर एक दिन…………

अनगिनत सपनों औ’अरमानों की झोली,
भिखारन के आँचल सी हो गई तार-तार,
और सारी कोद्गिाद्गों हो गईं बेकार………..

उन्हें मनाने की हर कोद्गिाद्गा हो गई नाकाम ,
जिन्होंने सुनाया तुम्हें मार डालने का फरमान,
ये कैसी कद्गामकद्गा में जी रही हूँ मैं,
हर धड़ी, खून का घूँट पी रही हूँ मैं,
नहीं मारा तो मारी जाउँगी इस घर में,
मार डाला तो जी न पाउँगी इस घर में,
बेटा और सिर्फ बेटा जनने का आदेद्गा था,
क्या यह मेरे वद्गा में द्योच्च था……..

तेरी करुण पुकार और जीवनदान की भीख,
मेरी कद्गामकद्गा को देना चाहती है सीख,
प्राण न्योछावर कर तुम्हें इस दुनिया में लाना है,
मेरी बच्ची तुम्हें अपना रास्ता खुद बनाना है,
नहीं मालूम, सफल होउँगी या असफल,
धधकते द्याोलों पर चलना है मुझे हर पल,
दिखाने के लिए तुम्हें सुनहरा कल……………
एक सुनहरा कल……………

सुघा गोयल ‘नवीन’

6 Comments

  1. pallawi says:

    bohut hi achcha warnan hai bohut pasand aayi aapki ye rachna!!
    aap bohut achcha likhti hain bht saare padhe hai aapke !!

  2. Abhishek Khare says:

    बहुत बढिया सुधा जी

  3. Vishvnand says:

    बहुत बढ़िया भावपूर्ण अर्थपूर्ण रचना
    हार्दिक अभिवादन

    (कुछ शब्द ठीक नहीं छपे हैं पर पढ़ने समझने में कोई कठिनाई नहीं है)

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