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गर न होती – कशमकश

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Hindi Poetry, Nov 2010 Contest

उलझी सी जाती है ज़िन्दगी

है कैसी ये कशमकश

बिखरती सी नज़र आती है ज़िन्दगी

जाने क्यों होती है कशमकश

अथाह , अनंत और  अपार सी

लगने लगी मुझे ये कशमकश

आदि न अंत है जिसका

होती क्या ऐसी ही कशमकश

अनसुलझी सी भरी उलझन से

उलझी उलझी सी ये कशमकश

सुलझाने की कोशिश में अब तो

बन गई हूँ खुद ही कशमकश

जीवन तो भरा कशमकश  से

बन गई मौत भी मेरी कशमकश

न सुलझी न सुलझेगी

न बदली और न बदलेगी

शायद होती ऐसी ही कशमकश

..

पूछ बैठी ये सब कुछ

इक दिन मै खुद से ही

ढूँढना चाहती थी जिसको

मिला वो जवाब भी खुद से ही

पूछती हो बार – बार ही तुम

क्यों होती है ये कशमकश

न सीख पाते हम तुम

गर न होती ये कशमकश

जीते है जिंदादिली से कैसे

क्या होता है गम और क्या हर्ष

न ही कर पाते तुम  कभी

जीवन की सफलता को स्पर्श

गर न होती ये कशमकश

गर न होती ये कशमकश

9 Comments

  1. rajivsrivastava says:

    good one neha !keep it up

  2. nitin_shukla14 says:

    ek kashmkash se paripoorna rachna
    Good One

  3. Vishvnand says:

    बहुत अच्छी मनभावन रचना
    सांसारिक कशमकश से आत्मज्ञान और सदविचार की ओर
    रचना के लिए हार्दिक बधाई

    • neha goyal says:

      @Vishvnand, शुक्रिया विश्व जी, आपके कमेन्ट से उत्साह व् हर्ष महसूस कर रही हूँ ……जो message मै इस poem के ज़रिये देना चाहती थी वह आप तक बखूबी पहुंचा …धन्यवाद्

  4. Abhishek Khare says:

    Nice one, keep it up.

  5. ruchi sharma says:

    मै भी कशम कश मै पड़ गई हूँ नेहा जी की क्या कमेन्ट दूँ इस सुंदर और अर्थपूर्ण रचना को …..बधाई

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