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Nazm

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Hindi Poetry
वो भी दिन थे कि बोझ दिन भर का….
शब की खूँटी पे टाँग देता था…
अपना बेहिस, थका बदन लेकर..
शब के बिस्तर पे फ़ेंक देता था..
ऐसे सोता था ‘बेच कर घोड़े’..
जैसे अब फिर कभी न उठना हो…
अब मैं बिस्तर पे सो भले जाऊं…
देर तक छत को तकता रहता हूँ..
नींद आँखों में अब नहीं आती..

दिल की धड़कन में इक सलीका था..
नब्ज़ भी एक लय में चलती थी…
अब न धड़कन, न नब्ज़ में लय है..
नब्ज़ बोझिल सी लय में चलती है..
दिल भी बेढब सा कुछ धड़कता है…

भूख भी पहले ठीक लगती थी…
जो भी खाता था ‘तन पे लगता था’..
अब मैं खाने को बैठ भी जाऊं…
कुछ भी खाने को जी नहीं करता..

यूं तो ये उम्र के तकाज़े हैं..
फिर भी तन्हाइयों में सोचता हूँ..
एक तरतीब शब-ओ-रोज़ में थी..
थे, मगर इतने मरहले भी न थे..
ज़िन्दगी में मेरी तवाजुन था..
थे, मगर इतने मश’अले भी न थे…

सीधी सादी सी जिंदगानी में ..
अच्छा होता कि तुम नहीं आती ..

4 Comments

  1. Vishvnand says:

    प्यार में गम से गुजरना
    लिखी है मनभावन रचना
    बधाई
    और p4poetry पर आपका हार्दिक स्वागत

  2. prachi sandeep singla says:

    veryyy nicely carved sir 🙂 welcm 2 p4,,luking 4wd 2 have more from u in d coming dayz nd plzz post d tittle of ur poem also in devnagari..dat will attract more 🙂

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