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स्पर्श तुम्हारा…

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Hindi Poetry

तुम्हारे स्पर्श की अनुभूति
फिर ले गयी उड़ाकर पल में
बादलों से घिरे चाँद के बीच ,
लुकती-छिपती चांदनी जहां
तारों से खेले आँख-मिचौली
ज़मीं को किंचित सा रूप दिखा
रही अपनी रौशनी को तरसा|

तुम्हारे स्पर्श का एहसास
ठंडी ओस का दे गया आभास
शीतल सी इक लहर उठी
समुन्द्र की सुस्त लहर सी
नदियों की लहरें अनेक
जहां आ कर हो गयीं एक|

तुम्हारे स्पर्श की अनुभूति
फिर ले गयी उड़ाकर मुझे
फूलों लदे बागों की ओर
झोंका सा इक हवा का आया
चुरा फूलों की खुशबू लाया
बिखरा गया मेरे चहुँ ओर
तुम्हारे इक स्पर्श का शोर|

7 Comments

  1. rajiv srivastava says:

    baache ko ma ka sparsh,vridh ma-baap ko bachho ka sparsh,premi ko saathi ka sparsh shisya ko guru ka sparsh ka koi vikal nahi hai–ye atant hi sukhdayi aur prenamayi hote hai———— kya khoob likha hai badahai

  2. Vishvnand says:

    स्पर्श की अनुभूति की सुन्दर अभिव्यक्ति
    रचना बहुत मन भायी

  3. sushil sarna says:

    हकीकत के आसमान पे कल्पना की कलम से बादलों के कगज पे भावनाओं की स्याही से लिखी स्पर्श की अनुपम व्याख्या- इस रचना को मेरा सलाम और आपको बहुत बहुत बधाई परमिन्द्र जी

  4. Harish Chandra Lohumi says:

    अच्छा लगा ! “स्पर्श तुम्हारा” ।
    बधाई !!!

  5. rajdeep says:

    amazing
    i liked it ma’am

  6. Ruchi_Misra says:

    Very nice..

  7. parminder says:

    आप सब मित्र-गणों का ह्रदय से आभार कि आपने इस रचना को सराहा |

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