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धन्यवाद

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Hindi Poetry

मेरे विचारों की ऊबड़-खाबड़ पथरीली जमीन पर
रोज तुम्हारे कोमल पाँव छलनी होते हैं
और मेरी निर्मम पाशविकता से
रोज तुम टूट कर लड़ती हो
फिर भी उफ़्फ़ नहीं कहती.

मेरे और तुम्हारे बीच निर्णयों की जो कंटीली झाड़ है
उलझ उलझ कर गिरती हो तुम उनसे
और मेरी कटु संवेदनाओं से
रोज तुम मृदुता से झगड़ती हो
फिर भी उफ़्फ़ नहीं कहती.

और मूक मैं –
सब देखता समझता हूँ.
मन ही मन कई बार कहता हूँ
लेकिन तुम्हारे सामने एक बार नहीं कह पाता –
वो एक शब्द –
जिन्हें तुम हज़ार बार जीतती हो मुझसे.

“धन्यवाद”

6 Comments

  1. rajiv srivastava says:

    kya baat ,kya andaj–bahut khoobsurat ,bahut dilkash hai aap ki ye rachna

  2. Vishvnand says:

    बहुत सुन्दर अहसास की अभिव्यक्ति ,
    अंदाज़- ए – बयान अति मनभावन
    हार्दिक अभिवादन

  3. sushil sarna says:

    विकास जी मैनें आपकी रचनाओं को काफी पढ़ा है – उनमें दिल तक उतरने की अजीब सी शक्ति है-हर पंक्ति हर शब्द अपने में एक भाव संजोये है-आपकी रचना में अजीब सी कशिश है- इस रचना पर मेरी और से आपको हार्दिक बधाई भगवान् आपकी कलम को हमेशा आगे और आगे बढने और लिखने की शक्ति दे-

  4. parminder says:

    वाह, क्या अंदाज़े बयाँ है ! मुझे लगता है, यह बीमारी काफी आम है, 🙂 सुशील जी से पूर्णतयः सहमत हूँ, हर रचना आपकी दिल तक उतरती है!

  5. nitin_shukla14 says:

    ati sundar rachna Vikash Ji
    Badhaiii

  6. prachi sandeep singla says:

    awesome 🙂 hv read ur blog too…padh kar achcha laga…keep it going 🙂

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