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सत्य-वचन !

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Hindi Poetry

कोई काज छोटा नही, छोटी होती सोच!

दिल से हर काज कर, काहे का संकोच!

मन मे हिम्मत जोड़ ले,तो बन जाए हर बात!

जुगनू भी प्रकाश निकाल ,आँधियारे को दे मात!

दान ,धर्म,कर्म और पूजा सब वयर्थ ही चला जाता है!

जो माँ-बाप को धिक्कार्ता वो नरक मैं ही जगह पता है!

छोटा करे जो काज,वो बड़ा नही कर पाय!

जो सीना हो वस्त्र को,तलवार कौन चलाय!

सौ-सौ दुश्मन होये तो,तनिक कष्ट हो जाय!

एक दोस्त दुश्मन सरीखा , तो सब नष्ट हो जाय!

जो मन का पेट काबू करे,वो बड़ा सुखी हो जाय!

तन का पेट मासूम है, रूखी-सुखी से ही भर जाय!

कलम से पन्ने पे लिखा,एक दिन मिट जाय!

जो मन की तख़्ती पे लिखा,वो ही साथ निभाए!

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

18 Comments

  1. Dhirendra Mishra says:

    Hi Rajiv
    Very nice and well written.
    But I would like to draw attention that it is not “दोहा”. it is a composition. In hindi “दोहा” it follows certain rules of “मंत्राएँ”. For example, “दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करें न कोय |” First portion contains 13 “मंत्राएँ” and second one 11 “मंत्राएँ”. It is followed in each line of “दोहा”. Please don’t take it as otherwise it is just friendly suggestion.

  2. rajiv srivastava says:

    thanks a lot ,please elaborate it-what are mantrayen? thanks for taking so much pain for me .Please correct any one of them to make me understand better .

  3. Vishvnand says:

    रचना काफी अर्थपूर्ण सी है मगर पढ़ने में rhythm ठीक नही बैठता इस से इसकी beauty और उचितता पर बहुत फर्क पड रहा है. अर्थपूर्ण होते हुए भी इस रचना में बहुत कुछ कमी सी महसूस हो रही है; सुधार की जरूरत प्रचीत होती है.
    दोहे और मात्रा के बारे में मुझे कोई साहित्यिक knowledge अब तक नही है पर शायद धीरेन्द्र जी ने विदित की हुई रचना में त्रुटी के कारण ही rhythm ठीक न बैठ रहा हो

    • Vishvnand says:

      अर्थ और Rhythm को ध्यान में रख मैंने पहली दो पंक्तियों को re -cast करने का प्रयास किया जो इस प्रकार हुआ…
      काज कोई छोटा नहीं, छोटी होती सोच,
      हर काज दिल से करें, काहे हो संकोच ….

      • Vikash says:

        @Vishvnand, विश्वानन्द जी! आपकी पंक्तियाँ छंद बद्द्ध तो हैं लेकिन तकनीकी रूप में ‘दोहा’ अब भी नहीं हैं. दोहा में १३-११ | १३-११ मात्रायें होनी चाहिये.

        • Vikash says:

          @Vikash, मात्राओं की संख्या के अलावा दोहा होने की एक और शर्त है : दोनों पंक्तियों के अंत में एक बड़ी और उसके बाद एक छोटी मात्रा होनी चाहिये. ध्यान देने योग्य बात ये है कि आपने ना जानते हुए भी ये सही प्रयोग किया है. हरीश जी का नीचे वाला उदाहरण भी इस पैमाने पर खरा उतरता है. छंद शास्त्र के सारे नियम लय को सुधारने के लिये ही हैं. अतः लय जिनके लिये स्वभाविक है – वे नियम ना जानते हुये भी नियम का पालन कर लेते हैं. 🙂 (राजीव जी के तथाकथित दोहे में भी इस नियम का पालन हुआ है)

          इसके अलावा एक और नियम है – पहले और तीसरे चरण में ऐसा कोई शब्द ना हो जिसमें ’छोटी-बड़ी-छोटी’ मात्रा आती हो. यह दोहे में एक दोष माना गया है. जैसे – “निकाल”. (ऐसे किसी भी दोहे को पढ़ते समय खुद ब खुद कुछ ’अजीब’ लगेगा). साहित्यिक दृष्टिकोण से इसे चांडालिक दोहा कहा गया है.

          कुछ ज्यादा हो गया. 🙂 बाकी कभी बाद में.

        • Vishvnand says:

          @Vikash
          शुक्रिया.
          मैंने इसे दोहा नही कहा. मैं तो सिर्फ “rhythm” की बात ही कर रहा था.
          जानता हूँ, अपनी किसी रचना को दोहा कहने के पहले इस बारे में उचित ज्ञान सम्पादन बहुत जरूरी है .

  4. Harish Chandra Lohumi says:

    रचना में ब्यूटी बहुत, अर्थपूर्ण है सार,
    रिदम बैठ पाया नही, मात्रायें लाचार !

    वैसे सार बहुत मन भाया !

  5. nitin_shukla14 says:

    राजीव मैंने आपकी बहुत सारी रचनाएँ पढ़ी हैं और हमेशा उन्हें विचारों से परिपूर्ण पाया है, जो आपकी अच्छी सोच को व्यक्त करता है
    अब अगर हम आपकी इस रचना की बात करें, तो यदि आप इसका विषय बदल दें,तो यह भी एक खूबसूरत रचना कहलाएगी
    मुझे पता है, आप बहुत ही Creative हैं और अक्सर कुछ नया प्रयास करतें हैं परन्तु हिंदी साहित्य में दोहों का बहुत महत्व है और उससे लिखना बिलकुल भी आसान नहीं
    मैं धीरेन्द्र जी से पूर्णतः सहमत हूँ, की दोहे लिखने के कुछ नियम होतें हैं, उन्हें निभाए बिना दोहों की रचना नहीं हो सकती –
    दोहे के पहले और तीसरे चरण में १३-१३ मात्राएँ और दूसरे और तीसरे चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं, जब मात्राएँ गिनी जाएँ और वह इस अनुसार न निकलें तो वह दोहा नहीं कहलाता
    अब बात करें की मात्राएँ कैसे गिनी जातीं तो बहुत गहराई में जाये बिना बता दूं, अक्षर या वर्ण दो प्रकार के होते हैं – लघु और गुरु
    लघु का चिन्ह है – I और गुरु का s , उदाहरण स्वरुप राजीव में दो गुरु और एक लघु है, रा – s , जी – s , व- I
    लघु में एक एवं गुरु में दो मात्राएँ होती हैं, इस प्रकार राजीव में कुल पांच मात्राएँ हैं –
    उदाहरण स्वरुप –
    IIII SS SIS II SS II SI
    रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून
    SS IS I SIS SS SII SI
    पानी गयो न ऊबरो , मोती मानस चून

    धीरेन्द्र जी अगर हमने कहीं कुछ गलत लिखा हो तो बताएं जरूर
    राजीव अब आप स्वयं अपनी रचना का को पढ़ें और पता लगायें की यह दोहा है या नहीं और किसी भी प्रकार ki query मन में आये तो जरूर पूछें

    • Vikash says:

      @nitin_shukla14, बेहतरीन व्याख्या के लिए आभार. निःसंदेह दोहों की गरिमा का ख़याल कवि को हमेशा रखना चाहिए.

    • rajivsrivastava says:

      @nitin_shukla14, nitin ji kin shabdo se aap ka dhanyavad karo samajh nahi aa raha hai.mujhe wakil dohe ke vishay me gyan nahi tha ,par ye likhne se ek baat aachi ho gaye –mujhe jankari mil gai–baad me ek baar phir prash karoonga .maine apne is rachna ko dohne ki sredi se alag kar-“SATYA VACHAN’ KI sredi me la diya hai,ek baar punah dhanyavad

      • nitin_shukla14 says:

        Dear Rajiv,
        You are always Welcome. Being a member of P4 poetry, this is my duty to share my knowledge whatever I know.
        You must always try, but there are few rules which are left out in my description too but its there in Vikash Ji description.Pl read that carefully before trying once again.

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