« »

कवि और कविता का संवाद – भूत से वर्त्तमान तक

2 votes, average: 4.00 out of 52 votes, average: 4.00 out of 52 votes, average: 4.00 out of 52 votes, average: 4.00 out of 52 votes, average: 4.00 out of 5
Loading...
Hindi Poetry
कविता कवि से-
  
तू उठा मेरे उदय से, नाम पाया जब मैं जन्मी |
मैं न होती तू न होता, शब्द बिखराते निरर्थक |
 
बिखरे – बिखरे शब्द ह्रदय में, हुए अलंकृत पल भर में |
सुन्दर मोती यथा सीप में, निर्मित होते सागर में |   
 
तेरे हिय में उतर गयी जब, मेरी इतराती मूरत |
कृति बनकर छाई पृष्ठों पर, कवि तब ही तो कहलाया |
 
कवि कविता से-
 
अर्थपूर्ण शब्दों को संजोया, सिंचित किया भाव और रस से |
बिखरे पुष्प गुंथे माला में, कंटकरहित लगे सुंदर से |
 
कवि-ह्रदय से प्रकट हुई हो, “कविता” नाम दिया है तुमको |
रह जाती रसहीन भटक कर, सूखे “गद्य” नाम पत्रों पर |
 
कविता की पीड़ा कवि से-   
 
कवि कविता से-
जीर्ण अवस्था में बिखरी सी, सूखी सी रसहीन बिलखती |
हाय ! कौन तुम मेरे द्वार, कौन दशा का है करतार ?
 
कविता कवि से-
इठलाती थी छवि पर अपनी, कविता है मेरा नाम |
फँसी भंवर में “गद्य- पद्य” के, भटक रही हूँ अब अविराम |
 
भाव-रसों के आभूषण से, हुई अलंकृत शब्द-सुमन से |
सबकी प्यारी थी सर्वोपरि, छाया था मुझ पर अभिमान |
 
आज हमारी दशा देखकर, द्रवित हुए हो क्यों कविराज ?
छीन लिये आभूषण मेरे, विलग किया मेरा सुर-साज |
 
आज हमारी विनती सुन लो, पुनः सुसज्जित कर दो आज |
मेरे नव-जीवन, नव-कविता का, उदय करा दो आज |
 

(रूचि मिश्रा)

Leave a Reply