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न सच है कि मेरा असर कुछ नहीं है.

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Hindi Poetry
न सच है कि मेरा असर कुछ नहीं है.
नज़र क्यों झुकी है अगर कुछ नहीं है.
 
तुम्हारी वफ़ा के भरोसे हैं जीतीं
मुरादों की वर्ना उमर कुछ नहीं है.
 
सहमते सहमते तेरे दर तो आये
तुझे करने लायक नज़र कुछ नहीं है.
 
नशेमन को शाखें, न चुगने को दाने,
परिंदों यहाँ पर बसर कुछ नहीं है.
 
बुलंद हिम्मतें हों यकीं बाजुओं में,
तो फिर खौफे तेगो तबर कुछ नहीं है.
 
ये किसके लिए जांनिसारी करोगे,
उन्हें आपकी तो  खबर  कुछ नहीं है.

8 Comments

  1. rajivsrivastava says:

    kya khoob kaha–sunder rachna badahai

  2. anuragjain says:

    वह वह …मज़ा आ गया… बहुत शानदार ….बहुत खूब लिखा है आपने….

    नशेमन को शाखें, न चुगने को दाने,
    परिंदों यहाँ पर बसर कुछ नहीं है

    क्या ग़ज़ब लिखा है…

  3. Vishvnand says:

    सुन्दर से शेरोन की इसमे लड़ी है
    प्यारी ग़ज़ल इसमें क्या कुछ नहीं है …
    बहुत बधाई
    Commends

  4. sushil sarna says:

    very nice-written in a pleasent mood- badhaaee singh saahib

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