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है अगर प्यार तो तुम रूठ के जाती क्यों हो ?

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Hindi Poetry

अगर है प्यार तो तुम रूठ के जाती क्यों हो ?

गरचे नफरत है तो फिर लौट के आती क्यों हो ?

दिल को उलझाए मेरे दिल को जलाती क्यों हो

खेलती दिल से मेरे दिल को लुभाती क्यों हो ?

इधर है हाँ उधर है ना मैं क्या समझूं जानम

कभी कहो कि दिल में क्या है छुपाती क्यों हो ?

लगा के आग बैठ दूर सताती क्यों हो ?

पिघल के सींचती फिर खुद ही बुझाती क्यों हो ?

जिगर के पार हुआ तीर इधर है जाँ की बनी

अभी मरा कि नहीं देखती जाती क्यों हो ?

अदाहुश्न से कर क़त्ल लुत्फ़ खूब लिया

मरीज़ेइश्क को रहरह के जिलाती क्यों हो ?

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3 Comments

  1. siddhanathsingh says:

    theek theek lagi.

  2. prachi sandeep singla says:

    बड़े दिनों बाद दिखाई दिए साईट पर आप..?agree wid s.n sir comment but

  3. Vishvnand says:

    रचना की कल्पना और भाव बहुत मनभावन
    बधाई.
    “अगर है प्यार तो तुम रूठ के जाती क्यों हो ?”
    “अभी मरा कि नहीं देखती जाती क्यों हो” …. क्या बात है

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