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निरंतरता

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Hindi Poetry
“जीवन : कठिन परस्थितियों से जूझता हुआ एक अनजाना सफ़र; 
आईये इसे जीवंत बनाये निरंतरता को अपनाकर”
पर्वतों के अंचलों में, 
इक नयी सी राह देखी |
कुछ मचलती, कुछ लचकती,
अपनी ही धुन में सरकती,
इक नयी सी राह देखी |
पर्वतों के अंचलों में…….
 
थी प्रफुल्लित,  पूर्ण थी वह,
मुक्त भय से हो चली थी |
ह्रदय में थे पुष्प उसके,
कंठ से थे वृक्ष लिपटे,
पुष्पमाला को सजाये,   
 इक नयी सी राह देखी |
पर्वतों के अंचलों में…….
 
शांत थी, गंभीर थी वह,
दृढ विचारों को लिए थी, 
लक्ष्य था बस एक उसका,
थी किन्तु निश्चित सफलता,
है किसी के निकट जाना,
ढूढना उसको है पाना,
प्रीत भी तो है निराली,
 इक नयी सी राह देखी |
पर्वतों के अंचलों में…….
 
लगन सच्ची थी वहां पर,
ठहर जाना था न संभव,
थी निरंतरता अनोखी,
इक नयी सी रह देखी |     
पर्वतों के अंचलों में…….

अथक चलती थी निरंतर,
सोंचता उसका था अंतर,
कभी तो जीवन मिलेगा,
कभी तो मिलनी है मुक्ति,
इक नयी सी रह देखी |
पर्वतों के अंचलों में…….   
                                             (रूचि मिश्रा)
 

10 Comments

  1. siddha Nath Singh says:

    sundar bhav aur sundar nibhav, aap ki kavita ne nadi ko sachitra upasthit kar diya.kavita me pravah bhi payasvini jaisa hi hai.

  2. Vishvnand says:

    बहुत खूब, अति सुन्दर, अर्थपूर्ण
    अपने आप में अलग सी बहुत प्यारी रचना
    अति मनभावन
    इस रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई और धन्यवाद भी
    तथा
    आपका p4poetry पर हार्दिक स्वागत ….

    Please also do let us know something more about yourself in your profile which is presently blank.

  3. renu rakheja says:

    आपकी नयी सी राह बहुत सुन्दर लगी

  4. prachi sandeep singla says:

    welcm 2 p4 wid dis lovely poem ruchi 🙂

  5. nitin_shukla14 says:

    Ruchi Welcome to p4 poetry…………..
    Very Well Written.
    Khoobsurat Rachna….

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