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पानियों की प्यास हम अश्कों से बुझाने लगे थे……………..

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मै होश में कहाँ था वो जब जाने लगे थे
वस्ल में तनहाइयों के साये डराने लगे थे (वस्ल-मिलन)

चेहरे पर दर्द की दरारें उभर आने लगीं थीं
जिन्हें छुपाने में आरिज़ों को ज़माने लगे थे (आरिज़ों-गाल,चेहरा)

गिला दोस्तों का न दुश्मनों से शिकवा कोई
अब हम भी अपने हाल पर मुस्कुराने लगे थे

हर खता के बाद की तौबा हमने बाखुदा यारों
हर खता के बाद फिर खता वही दोहराने लगे थे

कोई दे किसी का साथ आखिर कब तक ए दिल
हम महफिलों में अपनी तनहाइयाँ सजाने लगे थे

सजदों की चोट से ज़मीन-ओ-ज़बीन हुए ज़ख़्मी (ज़मीन-ओ-ज़बीन -ज़मीन और माथा)
इबादतों को मेरी शायद वो अब आजमाने लगे थे

वक़्त ये भी गुज़ारा है हमने शकील सुनो ज़रा
पानियों की प्यास हम अश्कों से बुझाने लगे थे

2 Comments

  1. Vishvnand says:

    वाह वाह, क्या बात है, बहुत प्यारी नज़्म, मनभावन …बधाई
    शकील जी, चलो आप आये तो, देर आये पर दुरुस्त आये जनाब
    वरना साईट पर न आकर आप बेवजह हमें सताने लगे थे ….

    aap nazm ko title denaa bhuul gaye 🙂

  2. prachi sandeep singla says:

    superb,,plz give it a tittle also 🙂

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