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निर्देशक उवाच

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Hindi Poetry

कलाकार रंगमँच पर होते हैं और मैं पर्दे के पीछे छुप जाता हूँ.
सारी तालियाँ वो ले जाते हैं और मैं कहीं भीड़ में खो जाता हूँ.

इसलिए मैंने सोचा की हर बार मैं भी सबके सामने आऊँगा
और हर बार अपने बारे में बोलूँगा, कुछ नई बातें बताऊँगा.

और इसलिये आज भी मैं आपके सामने आया हूँ
और आपका वक्त बरबाद करने का सामान भी साथ लाया हूँ.

कहो तो आपको शब्दों मे उलझा दूँ या भावों के मोती से तोल दूँ
या फिर अपनी कर्कश आवाज में कुछ मीठी बातें बोल दूँ
पर आज…सोचता हूँ की अपनी सृजन शक्ति का राज खोल दूँ.

हाँ यह सही होगा…क्यूँकि कई बार कुछ लोग ये पूछ्ने चले आते हैं
कि ओ कवि…! ओ नाटककार…! ये नाटक, ये गीत आप कैसे लिख पाते हैं?

आज तक तो मैं टाल देता था, पर आज बताता हूँ
और अपनी कलम की ताकत का राज समझाता हूँ.
चाहो तो हँस लेना, या जूते फ़ेंकना, इन बातों से कब घबराता हूँ?
पर सच तो यही है कि मै आप सबको मूर्ख बनाता हूँ.

आलसी हूँ, इसलिये अपनी कल्पना के घोड़े नहीं दौड़ाता हूँ
और ये नाटक ये कहानियाँ कहीं और से नहीं लाता हूँ
आपके साथ बैठ के आप के ही किस्से चुराता हूँ
और फिर आपकी ही थाली मे परोस कर, आपके सामने ही खा जाता हूँ

और आप हैं कि कठपुतलियों की तरह ताली बजाते हैं
मेरी बात को सुनते हैं, पर उसे कभी समझ नहीं पाते हैं
और हँसी तब आती है, जब वही गलतियाँ बार बार दुहराते हैं
और हम जैसे लोग फिर से वही आईना आपके पास लाते हैं
और आप फिर तालियाँ बजाते हैं, पर समझ फिर भी नहीं पाते हैं.

मगर मैं हिम्मत नहीं हारता, नये उत्साह से भर जाता हूँ
और फिर से आपके बीच जाता हूँ, फिर से कहानियाँ चुराता हूँ
थोड़े रँग बदल कर, फिर से वही चित्र आपके पास लाता हूँ
कभी सराहा जाता हूँ, तो कभी कभी गालियाँ खाता हूँ
पर फिर भी मैं नहीं डरता, हर बार यही कविता सुनाता हूँ.

कभी कभी लोग मेरी बातों से ऊब जाते हैं, बोर हो जाते हैं
जो सह नहीं पाते वो गुस्सा दिखाते हैं, उठकर बाहर चले जाते हैं
पर कुछ समझने की कोशिश करते हैं, गम्भीरता से अपना सिर हिलाते हैं

और हम…उस एक हिलते सिर को ही दर्शक समझते हैं
उस एक हिलते सिर को ही नाटक दिखाते हैं
उस एक हिलते सिर के लिये गीत लिखते हैं
उस एक हिलते सिर को ये कविता सुनाते हैं.

बहुत सारे लोग जिन्दगी को टटोलने कि कोशिश मे मर जाते हैं
और कुछ महापुरुष मुर्दों की तरह जिये चले जाते हैं
कुछ लोग अपनी जिन्दगी से खफ़ा हो रोते हैं, चिल्लाते हैं.

पर कुछ पागल हर बोझ को खुशी खुशी उठाते हैं
जिन्दगी से लड़ते हैं, फिर भी गाते हैं, मुस्कुराते हैं

नक्कारखाने मे तूती की आवाज कोई नहीं सुनता
इसलिये हम उन पागलों की खोज में ही सिर खपाते हैं
गलियों मे घूमते हैं, सड़कों पे आते हैं
आधे पेट खाते हैं, और दुगनी ताकत से चिल्लाते हैं.
और दूर कहीं कोने में, एक वैसा पागल पाते हैं.

और फिर…उस एक पागल को ही हम दर्शक समझते हैं
उस एक पागल को ही हम नाटक दिखाते हैं
उस एक पागल के लिये ही गीत लिखते हैं
उस एक पागल को ही ये कविता सुनाते हैं.

– १५ मई २००६ को

3 Comments

  1. Vishvnand says:

    Fantastic deliberation & unique style Hindi poetry
    Very meaningful intense pondering & sensitivity,
    provoking thoughts to muse in all directions with liberty…
    Hearty kudos to you for this profound beauty….
    Liked immensely

  2. prachi sandeep singla says:

    itz awesome vikash

  3. siddha Nath Singh says:

    itni sargarbhit aur sanshlist rachna, vaah kya kahne bhai.

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