« »

हर सुबह खुद को खोजती हूँ !!

2 votes, average: 4.00 out of 52 votes, average: 4.00 out of 52 votes, average: 4.00 out of 52 votes, average: 4.00 out of 52 votes, average: 4.00 out of 5
Loading...
Hindi Poetry

मैंने उन हज़ार बूंदों में खुद को खोजा , मै बूंद नहीं थी!

मैंने रंग बिरंगी तितलियों में खुद को खोजा,मै तितली नहीं थी !

सपने देखनेवालों में खुद को खोजा,मै हकीकत देखती थी!

मैंने तारे गिनने वालों में खुद को खोजा मै बादलों के पीछे भागती थी!

मैंने भीड़ में खुद को खोजा मै तो तन्हाई में भी खुद को खोजती थी

मैंने चारदिवारी में खुद को खोजा मै तो कैदी तक नहीं नहीं थी!

मैंने उचाईयों में खुद को खोजा मै ज़मीं पर थी गिरने से डर लगता था !

मैंने किताबों में खुद को खोजा मै अक्षर तक नहीं थी !

लोगों ने मेरी ख़ामोशी टोकी मै वाचाल हो गयी, हालाँकि शब्द तक मेरे अपने नहीं थे!

लोगों ने कई नाम और टिपण्णी दिए मै इनसे भी परे थी !

मै क्या थी ? मेरा अस्तित्व क्या था पता नहीं !

मै ,मै तक नहीं रही मै खोने लगी!

हर रात सोच सवाल मुझे नोचते है, झकझोरते है, मेरा अस्तित्व पूछते हैं

और हर सुबह अपनी ही खोज में निकल पड़ती हूँ !

8 Comments

  1. ANUJ SRIVASTAVA says:

    NICE ONE……..DEEP THINKING

  2. dr. ved vyathit says:

    बहुत सोचता रहा हवा को अपने साथ बहा लूं
    बहुत सोचता रहा आज दिन डूबे नही बचा लूं
    पर दोनों ने किया वही जो उन की मजबूरी थी
    मुझ को भी समझाया मैं अपने मन को समझा लूं

    निरंतर लिखती रहो वस्तु परिगण सैली का सुंदर उपयोग किया है साथ में कुछ अच्छा साहित्य भी पढो अध्ययन बड़ा जरूरी होता है साहित्य की समझ विकसित होती है
    मेरी हार्दिक शुभकामनायें हैं

  3. Harish Chandra Lohumi says:

    बहुत सुन्दर रचना पल्लवी जी,
    जब खुद को हर सम्भावित चीज में ढूँढ चुकी हैं तो सम्भवतः खुद को खुद में भी ढूढने का प्रयास भी कर ही चुकी होंगी ।

    हार्दिक बधाई !!!

  4. parminder says:

    बहुत नामुमकिन सा काम है खुद को ढूँढना , और हर क्षण विभिन्न रूप बदलता हमारा मन, स्थिर होगा तो ही तो मिलेगा न? सुन्दर लिखा है|

Leave a Reply