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थकन

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Anthology 2013 Entries, Hindi Poetry

अपनी थकन कहाँ उतार दूँ
एक पल के लिए ज़िन्दगी उधार दूँ ?

खो जातें हैं सूखे रेत पर पलकों से चंद बुँदे
कहो न आज इनसे दरिया उतार दूँ
एक पल के लिए ज़िन्दगी उधार दूँ ?

टहनियों पर पत्ते बोहुत कम हो गये हैं
पतझड़ कभी जाता नहीं कैसे इन्हें बहार दूँ
एक पल के लिए ज़िन्दगी उधार दूँ ?

इस मतलबी दुनिया में मै भी मतलबी हो गयी
जरा ठहरो ! थोडा मतलब निकाल लूँ
एक पल के लिए ज़िन्दगी उधार दूँ ?

होती रहती है दर्द की बारिश
बन जातें हैं दर्द के गड्ढे
थोड़ी सुख की मिटटी उधार दोगे?
गड्डे नहीं भरेंगे गहराई कम होगी न
कहो न एक पल के लिए ज़िन्दगी उधार दूँ ?

धरती की ब्याकुलता इतनी क्यों बढ़ गयी
खुद से झरने फूटने पर भी प्यासी क्यों रह गयी
इसके तपन को थोडा करार दूँ
कहो न एक पल को ज़िन्दगी उधार दूँ ?

मौन से खड़े तुम ? कही मेरी निशब्दता
तुम पर भी तो हावी नहीं हो गयी ?
या फिर तुमने भी अपना सिर्फ मतलब निकाला है?

8 Comments

  1. Vishvnand says:

    बड़ी मनभावन रचना
    वैसे एक बात तो बहुत सही है,
    आपकी इस रचना के अंदाज़ में बहुत मतलब भरा है,
    और हर बार पढ़ने पर अलग अलग होकर निकलता है .
    बहुत सुन्दर
    हार्दिक बधाई, keep it up

  2. nitin_shukla14 says:

    Great Thinking, Nice Thoughts and Complete Analysis.
    Congrats !!!!!

  3. Tushar Mandge says:

    बहुत अच्छी कविता है पल्लवी….गहरे भाव प्रकट करती हुई
    keep writing….

  4. prachi sandeep singla says:

    good effort pallawi,,i like d imagery nd d way u hv chosen words over here..keep sharing 🙂

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