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“छोटा सा आसमान”

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नजारा एक देखा था बडा सुहाना,
चाँदी का आसमान या कहें ईश्वर का सुंदर नजराना.
सितारों जडा था घनेरा घेरवाला लहंगा,
चाँद दहक रहा था जैसे चाँदी का छल्ला.
था यह एक रात का आसमान,
था यह मेरे गाँव का चमकीला जहान.
शहरों के आसमान में वो सितारे वो चाँद कहाँ,
दो फुट की खिडकी से दो फुट का दिखा आसमान.
चार सितारे थे सामने टिमटिमा रहे,
घने ईमारतों के बीच चाँद था अस्त हुआ.
हमने पूछा उन तारों से “कहाँ गये वो सारे साथी”,
कहाँ गये वो चाँद के बाराती?
वो लगे करने शिकायत हमसे,
तुम्हारे शहर में है कितनी आबादी,
प्रदुषण का है बादल और दुषित है वादी.
कृत्रिम रोशनी से जैसे रात में हो सुर्य का उजाला,
चाँद बना आसमान छुती ईमारतों का निवाला.
खो गये प्रदुषण की मोटी परत में सारे तारे,
हो गया खफा जैसे शहर का आसमान हमसे.
कह रहे हों, हम न जीयेंगे शहर की कोलाहलभरी जिंदगी,
चलो छोड आओ फिर हमें गाँव की उस शांत सुनसान गली.
राजश्री राजभर……….

9 Comments

  1. dp says:

    good one…

  2. Parespeare says:

    a beautiful poem,
    liked it

  3. siddhanathsingh says:

    sundar kavita me matraon ki galtiyan khalin-
    प्रदुषण का है बादल और दुषित है वादी. सुर्य का उजाला, आसमान छुती ईमारतों

  4. dp says:

    कवित्व प्रदूषण का भी खतरा है सर.
    सावधान !!!!

  5. Vishvnand says:

    कविता सुन्दर अंदाज़ की भावनिक और अर्थपूर्ण है
    बहुत मनभावन
    बधाई
    कृपया कुछ गलत छपे शब्दों को एडिट कर सुधार दीजिये

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