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वह पीली साड़ी हरे पाट वाली

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Hindi Poetry

आँखों में लहराती
वह पीली साड़ी हरे पाट वाली
बहुत पसंद
टहलती संग
उस शरद की स्मृतियों का रंग लिए.

वह काली भी
जो उदास चेहरे पर
अधखिली मायूस तबस्सुम को ढके
खूब फबती, खूब भाती
बिजली गिराती.

पसंद नहीं थी वह एक
खरबूजे की ललाई वाली
संगत की मजबूरी
कि
तुम्हारी बेवफाई
_बार-बार रंग बदलती नज़र आती

One Comment

  1. siddha Nath Singh says:

    antim pankti tak aa kar bhramit ho gaya kya kahna chata hai kavi samajh n paya.

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