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भाग रहा दिन

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Hindi Poetry

हांक रहा सूरज
तारों की रेवड़।

शोर मचाते पक्षी
सूनी शाला
नहीं कहीं अध्यापक।

घूम रहे आवारा छोरे
भौंरे
चक्कर काट रहे कलियों के।

देर हो रही है दफ्तर को
भाग रहा दिन
धक्के खाता सिटी बसों में।

रोटी बेल रही चूड़ी
लट बिखराए
कागा टेर रहा मुंडेर पर
जल्दी आओ प्रीतम।

व्यस्त खेत में
फसल उगाते बैल
हांफ रही हैं मिलें उगलती धुंआ
झाँक रही छिपती शरमीली सांझ।

पड़ी हुई है रात गहन निद्रा में
आसमान का कम्बल ताने
पलकों में तिरता है
प्रियतम चाँद।

3 Comments

  1. prachi sandeep singla says:

    nice plot 🙂

  2. Parespeare says:

    nice poem

  3. parminder says:

    सुन्दर चित्र बनाया है प्रकृति का|

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