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***सपनों न इस दर पे आना कभी …..***

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Dec 2011 Contest, Hindi Poetry

सपनों न इस दर पे आना कभी

तुम्हें देखने का हमें  हक नहीं

है फुटपाथ पे जीना मरना हमें

तुम्हें  देखें अपनी वो हस्ती नहीं

सपनों न इस दर पे आना कभी …..

नहीं जानते रिश्ते होते हैं कैसे

फुटपाथ पर तो  खनकते हैं पैसे

किसी दर्द से  आँख ये रोती नहीं

किसी आँख में ममता होती नहीं

सपनों न इस दर पे आना कभी …..

कठपुतली की तरह हम नचाये जाते हैं

चंद सिक्कों में हम नुचवाये जाते हैं

धागे किस्मत के हैं औरों के हाथों में

जिन्दगी की यहाँ सहर होती नहीं

सपनों न इस दर पे आना कभी ……

सुशील सरना


11 Comments

  1. Vishvnand says:

    फूटपाथ पे रहने वालों का तो शायद सपना ही होता है अपना
    वरना ऐसे दुखी कष्टी जीवन जीने का क्या हो बहाना ….
    इस रचना का अंदाज़ कुछ अलग हो ऐसा है मेरा मानना…

    • sushil sarna says:

      @Vishvnand,
      आपकी इस प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद सर जी, विचार आपका भी गलत नहीं है और प्रस्तुति मेरी भी इस भावना के सिक्के का दूसरा पहलू है. आपके सुझाव का शुक्रिया सर जी

      • Vishvnand says:

        @sushil sarna
        आपके response का शुक्रिया. आपने मेरी बात समझी और बुरा नहीं माना इसलिए खुशी हुई.
        हाल ही में मैंने मुंबई में फूटपाथ पर रहने और भीख मांगने वाली फॅमिली के एक पिता ने अपने छोटे बच्चे को गोद लेकर कहते हुए देखा और सुना था ” बेटा तू बड़ा होकर अपने माँ बाप की देखभाल करेगा ना.”. आपकी इस रचना को पढ़ इस बात की याद आ गयी थी..

  2. kishan.R says:

    bahut acha sir ji…..vese khete he na…dukhiya ke dukh ko shukhiya kya jaane…sukhiya jo dukhiya ke dukh ko jaane to koi dukhi na rahe

  3. Raj says:

    Well presented. I agree that some people do not even get right/ luxury to see dreams.

    • sushil sarna says:

      @Raj,
      रचना की सुंदर, मनभावन प्रशंसा का हार्दिक शुक्रिया राज जी

  4. rajendra sharma'vivek' says:

    Rachanaa me samvedanaa paksh majboot hai

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