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वे दिन कुछ और थे

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Hindi Poetry

 

वे दिन कुछ और थे

जब सीना तान फुदका करते थे

उन जानवरों को धमकाते

निर्भय

जो हमें डराया करते थे

शेर का मुखौटा ओढ़े

तब एक बहुत बड़ा आंगन था

हमारे स्वप्नों के विचरने को

साथियों की भीड़ में

एक अनचीन्हा

गद्दार निहायत बेईमान

एक बुद्धू की बीवी ने

दूसरे काइयें की बीवी से

पाया एक मिंक का कोट

खूबसूरत फरों वाला

तभी

ठीक–ठीक तभी से

सिमटने लगी हमारी दुनिया

हम अब भी बैठते है हुजूमों मे

एक–दूसरे से लड़ते हैं इस बात पर

कि दूसरा कहां गलती कर रहा है

चीजों को आंकने में

कविता पढ़ी जाती है

कहानियां और लेख भी

हम सब एक–दूसरे  को गरियाते हैं

फिर कंधे से कंधा मिला तसल्ली भी देते है

नम आंखों के साथ

लेकिन सुनने वाला कोई नहीं होता

हमारे अपने कानों के सिवा ।

फर के कोट, मिंक –कोट अब खूब बिकने लगे हैं

औरतें चहकती हैं

आंखो मे नई डिजाइन के माल की प्रतीक्षा में

ऐसा क्यों हो रहा है

हम खूब चीखते हैं 

बहसों –मुबाहिसों में खूब शोर उठता है।

तडक–तड़क  टूटती हैं।

काफी की प्यालियां

इतने–इतने डेसिबल शेार।

कोई सुनने वाला भी तो हो

सब मुंह लटकाए खीझते हैं भीड़ में

मालूम है कि बीमारी है

सोचते हैं कि बीमारी दूर हो

लेकिन तसल्ली के सिवा कुछ भी नहीं

कभी–कभी मायूस हाथों से

सहलाते हैं निरखते

कभी यह कितना–कितना

खूबसूरत था ओजस्वी

मर्दानगी से भरपूर।

मुझे शक है

यह जो आदमी मेरे बगल में बैठा

उवाच रहा फलसफा कि सावधान

मिंक–कोट के बाजार में मत जाना

 शक है कि दबाए रखे है

वह भी बगल में मिंक का एक कोट

सपनों की शुरूआत वहीं से होती है

जहां से सपनों का अंत

मित्र पूछता है

यह शुरूवात है या अंत ?

 मै कहता हूं ठहरो

मुझे नहीं मालूम ।

2 Comments

  1. H.C.Lohumi says:

    gazab kaa manthan !!!!! pasand aayii !!!

  2. pabitraprem says:

    awashya aap ne kavitaa ke marm men paitha hai. aap kaa abhaar.

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