« »

विवश मीत मिल सका न आखिर

1 vote, average: 4.00 out of 51 vote, average: 4.00 out of 51 vote, average: 4.00 out of 51 vote, average: 4.00 out of 51 vote, average: 4.00 out of 5
Loading...
Hindi Poetry

विवश मीत मिल सका न आखिर मीत-विहीना ही रह आई
रहा तड़पता प्रेम इधर किस्मत ने लिखी जुदाई
कौन कहे किस्मत का लेखा जन्मों का था प्यार
मिलकर भी जीवन सूना कुछ बाकी रहा उधार
इधर विकल मन तड़प रट चले “प्रिया तुम्हें कैसे मै पाऊँ..
उधर उदास नयन आंसू भर बुदबुद करते “क्या बतलाऊँ..
हाय सुख न दे सकी कहूँ क्या किस्मत ही मेरी है ऐसी
किसे दोष दूं ,कहीं अभागी न हो जगत में मेरी जैसी”

3 Comments

  1. Vishvnand says:

    मनभावन रचना, बधाई
    “कौन कहे किस्मत का लेखा जन्मों का था प्यार
    मिलकर भी जीवन सूना कुछ बाकी रहा उधार”…
    अति सुन्दर ये पंक्तियाँ कोई लेना चाहे उधार .. 😉

  2. siddha Nath Singh says:

    achchhi madhur rachna.

  3. prachi sandeep singla says:

    awesome 🙂

Leave a Reply