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हासिल सफ़र का क्या है पता ही नहीं मिला.

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Hindi Poetry
हासिल सफ़र का क्या है पता ही नहीं मिला.
आया न एख्तिताम  को चलने का सिलसिला.
 
खेली तमाम उम्र यूँ पल पल लुका छिपी,
ऐसे ही धूप छाँव में भटका है काफिला.
 
सींचा जिसे लहू से जिगर के वो फूल भी,
आखिर तमाम गैर के आँगन में जा खिला.
 
हम भी अना के मारे नहीं कर सके दुआ,
वो भी अता न कोई हमें कर सका सिला.
 
गुलशन में उसके थे तो हरेक रंगों बू के फूल,
दामन में आये   खार ही, शाखें जो दीं हिला. 
एख्तिताम-end ,अना-self pride ,

12 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत अच्छे , हार्दिक बधाई
    प्यारा सा है ग़ज़लों की आपका ये सिलसिला ,
    खूबसूरती के शेरों को जो ये पढ़ने हमें मिला …

  2. kalawati says:

    bahut sundar kavita hai.

  3. U.M.Sahai says:

    अच्छी ग़ज़ल, एस.एन., बधाई.

  4. Raj says:

    वाह, आपकी कलम की जितनी तारीफ की जाये कम है.

  5. हमको कही भी आप सा शायर नहीं मिला.
    थमने न देना तुम कभी ग़ज़लों का सिलसिला.
    हर रोज़ हमको मिल रही गज़लें नई नई
    जैसे के गुल्स्ता में नया फूल है खिला.
    कुछ बात तो है,यु ही तो मदहोश ना हुए
    ग़ज़लों में क्या मिला के हमको दिया पिला.
    हम आपके अंदाज़ की तारीफ़ क्या करें
    नाज़ुक ख्याल से बना मजबूत है किला.
    “यशकीर्ति” की बात से कुछ बात ना बनी
    फिर से उठा लो लेखनी,कायनात को हिला

    aapki sunder gazal padhne के baad aapki तारीफ़ करने को मन chaha. kripya swikar करें. — vikas yashkirti

  6. prachi sandeep singla says:

    bahut khoob 🙂

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