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एक सवाल, जवाब और एहसास…

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Hindi Poetry

कमज़ोर हाथ, अनजान रस्ते,
गहरा विश्वास, सुन्हेरे खुआब,
कई शांत लम्हे, कशिश और तनाव,
और आखिरकार एक मंदिर का निर्माण…

इस मंदिर की बुनियाद थी विचार-धारा,
सिझा था यह पाकीज़गी और सच्चाई के घोल में,
वादा था इस का भविष्य-निर्माण,
संपूर्ण था यह अपने हुस्न में…

पर वो एक मासूम सा सवाल,
और मेरा वो उर्ड़ता हुआ सा जवाब…
कितना बड़ा था वो सवाल…
शायद उस मंदिर से भी बड़ा…

जिसे मैं मंदिर समझ रहा था,
वह अधूरा था, बना ही नहीं…
जिस में लोग पूजा कर रहे थे,
वह मंदिर था ही नहीं…!!!

और अचानक इस बात का एहसास,
एहसास से गहरा एहसास…
रूह को झकझोरने वाला एहसास…
बिलक-बिलक के रुलाने वाला एहसास…

मैं मंदिर बनाता आया हूँ,
मेरा शौक है और आदत भी…
मुझे मंदिर सजाने का शुहुर नहीं,
पर मंदिर अधूरा छोड़ने की भी फितरत नहीं…

मेरे अनेक मंदिर बन रहें हैं,
डरता हूँ, इसे अधूरा छोड़ दिया,
तो दूसरों का क्या होगा,
अपनी रूह की सचाई को मैं कैसे पंख दूंगा…

****** विकास राय भटनागर ******

7 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत सुन्दर गहन और विचारवंत रचना,
    जिसके अहसास में जवाब ढूँढ़ने अभी भी गुम हूँ,

    इस रचना के लिए हार्दिक बधाई और धन्यवाद भी …

  2. Nisha Kundu says:

    Dear Sir,
    would like to congratulate for this ACME poetry…!! It s full of deep feelings n like a gul-e-ranaa ( a beautiful flower ) in the world of poetry..!!!
    Regards

  3. Nisha Kundu says:

    Dear Sir,

    Would like to congratulate for this ACME poetry…It is full of deep feelings n just like a gul-e-ranaa (a beautiful flower) in world of poetry…!!!

    Regards

  4. Divya Tiwari says:

    Dear Sir,

    Vry nice poem sir.Very deep meaning!!

    Regards,
    Divya

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