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रौशनी

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Hindi Poetry

अगरचे बहार धुंधलापन  होता,

तो शायद कभी गिला न होता, 

शिकवा तो यही है, 

की नज़रों में  धुंध है…

    मैं  मुसाफिर तनहा, और मंजिल दूर…

    इस से डरा कब था मैं ?

    पर तन्हाई भी तनहा है,

    यह कभी सोचा न था…

तेरी दुनिया की रंग-रलियाँ,

मुझे भला कब अज़ीज़ रहीं,

बस रौशनी, सिर्फ रौशनी…

इस से कम कुछ तस्लीम नहीं…

***विकास राय भटनागर***

8 Comments

  1. vmjain says:

    बहुत उम्दा, विकास. तन्हाई तनहा भी हो सकती है- हमने भी सोचा न था. चौथी और पांचवी पंक्तियों में थोड़ी त्रुटियाँ है. सुधार लीजिये.

  2. prachi sandeep singla says:

    achchi lagi 🙂 keep it up

  3. parminder says:

    बहुत सुन्दर लगी|
    बस रौशनी, सिर्फ रौशनी…
    इस से कम कुछ तस्लीम नहीं…

  4. Divya Tiwari says:

    Very nice sir..!!

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