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माँ अब तुम मुझे कुछ सिखाती क्यों नहीं ?

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Hindi Poetry

माँ, बचपन में तुमने मुझे सातो रंग सिखाये थे
तो अब ये रंग मुझे दीखते क्यों नहीं
क्या ग़मों का रंग इतना गहरा हो गया ?

तुमने तो बड़ी मेहनत से चलना सिखाया था
तो कदम कदम पर गिरती क्यों हूँ
क्या पाँव तले ज़मीन इतनी खिसक गयी ?

मैं तो रोना जानती थी तुमने ही तो हँसना सिखाया था
तो अब मैं मुस्कुराती क्यों नहीं
क्या आत्मा इतनी निष्ठुर हो गयी की लबों को मुस्कुराने भी नहीं देती ?

माँ तुमने ही तो लोरियां ,गीत और कवितायें सिखाये थे
तो अब मैं गुनगुनाती क्यों नहीं
क्या जुबां पर मौन का आतंक इतना फ़ैल गया ?

तुमने ही तो हर परिस्थिति में लड़ना सिखाया था
तो अब मैं ये बज्रपात सह पाती क्यों नहीं
क्या मेरी हिम्मत पर वेदना का बोझ इतना बढ़ गया ?

तुमने तो मुझे जीना सिखाया था
तो अब मै हर पल गुजरती क्यों हूँ
क्या जीने का मूल्य इतना बढ़ गया की मैं खरीद न सकी ?

तुमने तो अक्षर से लेकर पूरी दुनिया दिखाई थी
तो अब मैं खुद को पहचानती क्यों नहीं
क्या मैं इतनी विकृत हो गयी ?

बोलो न माँ चुप क्यों हो? तुम्हारी ख़ामोशी खलती है
कहाँ गये वो रंग ,तुम्हारी मेहनत मेरी मुस्कराहट ,तुम्हारी लोरियां मेरी खनखनाहट
तुम्हारी पनीली आँखें ,और मेरा बज्र चेहरा एक ही रंग क्यों दिखाते है ?
बोलो न माँ अब तुम मुझे कुछ सिखाती क्यों नहीं ?

14 Comments

  1. Ravi Rajbhar says:

    तुमने तो बड़ी मेहनत से चलना सिखाया था
    तो कदम कदम पर गिरती क्यों हूँ
    क्या पाँव तले ज़मीन इतनी खिसक गयी ?
    wah…bahut sunder ..puri rachna sidhe dil ko chhu rahi hai..par ye line mujhe jyada pashand padi.
    badhai swikaren.

  2. vmjain says:

    बहुत सुंदर भावों से परिपूर्ण है. पढ़ कर मन द्रवित हुआ.

  3. dr.o.p.billore says:

    पल्लवी कविता तो बहुत अच्छी रची आपने |आपके भीतर बैठी कवियित्री को बहुत बहुत बधाई |किन्तु विद्यार्थी जीवन में इस तरह की कविता | माना कि माता शिशु की प्रथम शिक्षक होती हे | माँ ने बहुत कुछ सिखा दिया है |अब आपकी बारी है | याद रहे :- स्वयमेव-मृगेन्द्रता |
    यत्न देवो भव:| नर हो न निराश करो मन को | आदि आदि | यदि हमारी बातें बुरी लगे तो क्षमा करना | किन्तु उत्साह और उमंग से भरपूर रचनाओं की प्रतीक्षा है |
    प्रस्तुत रचना की उत्कृष्टता और श्रेष्ठता में लेश मात्र भी संदेह नहीं |पुन: बधाई

    • pallawi verma says:

      @dr.o.p.billore,
      aadarniya sir, mai aapke baat se puri tarah sehmat hun vidyarthi ziwan
      me aakar maan se itni upekhsa thik nahi ,parantu maine yahan waise paristhiti ka warnan kiya hai jahan sikh kaam nahi aate saare mandand dhare reh jaatein hai jab paristhitiyaan badalti hain or maan se bada koi sikhshak nahi hota or aise me maan k paas v koi sikh nahi hoti
      mera uddesya marta aisi paristhi ka warnan karna hai !!
      itne sundar aanklan k liye aapka tahe dil se dhanyabaad !!

  4. siddhanathsingh says:

    मार्मिक और सशक्त रचना.

  5. pabitraprem says:

    बहुत ही मासूम संबोधन है . जाहिर है की आप की सरल मासूमियत उसमें है. शब्दाडम्बर के बिना भी कविता अच्छी लगती है अगर वह दिल से आई हो.

  6. anil says:

    आप ने कविता में अपना गम दिखाया है पर इसमें बिना मतलब की बाते भी है कुछ पंक्तिया काफी काबिले तारीफ है और कुछ अनुपयोगी भी है

    • pallawi says:

      @anil,
      sabse pehle mai aapko dhanybaad dena chahungi aapne meri is rachna ko itne gehrai se padha or bohut achchi prtikriya bhi ki parantu ye mera gam nhi maine bas ek kabita likhne ki kosis ki hai or is baat se sehmat hu ki in panktiyon me anawasyak baatein hai parantu is kabita ke marm ko samajhne ke liye mujhe likhna pada
      aapne ise padha or comment kiya bohut bohut dhanyabaad aapka!!

  7. anil says:

    सफ फ सद ग ग फ ह ह ग ghhhhhhhh

  8. soumya says:

    first time iam reading poem like this..and it touched my heart:)

  9. pallawi says:

    thanx for such a wondrful comments thanx a ton……

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