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तुम क्यों चली गयी

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Hindi Poetry

अचानक से ढेर सारे पत्ते ज़मीं पर आ गिरे मै सहम गयी
तुम चली गयी पर अपनी बात छोड़ गयी
हर सुबह तुम्हारे होने का एहसास खोजती हूँ
हमारी बकबक के बीच तुम्हारी ख़ामोशी खोजती हूँ
रात की ख़ामोशी में कभी चुपचाप फुसफुसाते हुए किये हर बात खोजती हूँ
आज भी किताबों की आलमारियों में तुम्हारे पदचाप खोजती हूँ
नहीं बाँट सकती जो उस बचपन के हर जज्बात खोजती हूँ
मुस्कुराते हुए शाम का बीत जाना, हर दोपहर चाय के लिए चिल्लाना
क्या बताऊ साथ बिताये हुए लम्हों की बरसात खोजती हूँ
तुम हमारे साथ हो हम सब साथ हैं पर फिर भी ,

जीने के एहसास खोजती हूँ

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4 Comments

  1. Vishvnand says:

    एक सुन्दर भावनिक रचना
    मन भायी
    बधाई

  2. parminder says:

    बहुत सुन्दर! ऐसे लगा, बचपन की सखी को जैसे मैं भी ढून्ढ रही हूँ|

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