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बेरोजगार मित्र

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कटरा की अंधी गली में
कल मिला था मेरा मीत !
बाल रूखे ,ओठ सूखे
वेदना से ध्वस्त चेहरा
आँख में करुना की छाया
बांह ऐसे खुल पड़ी थी
दर्द ज्यो न सिमट पाया
शरीर जैसे मृत्तिका की सूखी भीत !!
कुछ दिनों पहले वो चेहरा
चाँद सा हँसता विहसता
दंत की वो धवल पंक्ति
जो सदा मोती बिखेरे
करती थी सुस्वागतम
न रही मुस्कान हँसता तो
रुदन का स्वर निकलता
गा रहा ज्यो करुण गीत !!
मैंने पूछा मीत क्या है हल तेरा ?
हंसते हंसते रो पड़ा बेहाल सा वो
पहले बेकल ,फिर संभल कर
ठहरा सूखी डाल सा वो
बोला सूखे स्रोत सारे
न रहे कोई सहारे
मोती मैं आया था चुनने
मिल गए पत्थर हैं सारे
कितना ढूंढा, कितना खोजा
पर न मैं पाया अभीष्ट
हा ब्यथा ही दौड़ता मैं थक गया हू
प्रकृति के सारे दुखो से अट गया हू
जेब सूनी,पेट सूना
नेत्र में सपने सजाये
वो चितेरा जो चला था चुनने
सागर से मोती
लुट चुका है ,बंट चुका है
जिंदगी की विभीषिका में
हाय यह सारी कहानी
सुन रहा कानो से अपने
देखता आँखों से पर
क्या व्यवस्था इतनी ज्यादा
दर्द की हमदर्द है ?
चेहरे पर आया पसीना
जेब में जब डाला हाथ
निकला कुछ सिक्को के साथ
उसका चेहरा आँखों में आया
कल की चिंता छा गयी आँखों में सारी
वेदना देती है संबल
पर ये पीड़ा बन गयी जो पर्वत से भरी
किसको यंहा जीने देगी
नगर नगर ,डगर डगर
तलाशनी होंगी राहे
युवावो के सपनों को
देनी होंगी बाँहे
समाज व देश की यह सबसे बड़ी परीछा है
विजय
कटरा अल्लाहाबाद में एक स्थान का नाम है

11 Comments

  1. pallawi says:

    शरीर जैसे मृत्तिका की सूखी भीत
    सूखे स्रोत सारे
    न रहे कोई सहारे
    मोती मैं आया था चुनने
    मिल गए पत्थर हैं सारे
    कितना ढूंढा, कितना खोजा
    पर न मैं पाया अभीष्ट
    हा ब्यथा ही दौड़ता मैं थक गया हू
    प्रकृति के सारे दुखो से अट गया हू
    berozgaari ka bohut hi achcha warnan hai
    ye lines mujhe bohut achchi lagi !!

  2. Vishvnand says:

    बहुत अच्छी रचना,
    गहन, भावनिक और मनभावन,
    बेरोजगारी की व्यथा का सुन्दर दर्शन,
    पर पढ़े लिखे बेरोजगारों में क्या उनका खुद का नहीं होता योगदान ?

    कई शब्द अनायास गलत से छपे हैं उन्हें edit कर सुधारने की जरूरत है

    • vpshukla says:

      @Vishvnand, आपका बहुत बहुत शुक्रिया सर जी !एडिट करने का प्रयास करूँगा !लम्बी कविता में ये गल्तिया हो जाती हैं !

  3. dr.o.p.billore says:

    मीत बचपन का मिला था
    बाद दशकों के लगा |
    होनहो यह विप्र द्वापर का
    सुदामा यूँ लगा |

  4. ramesh says:

    very good poem.bahut acchi lagi.
    Badhai in bhavo ke liye.

  5. parminder says:

    दर्द भरी वास्तविकता बहुत अच्छी तरह से पेश की है | सुन्दर |

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