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अजब खौफ दिल में समाने लगे हैं !

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Hindi Poetry

अजब खौफ  दिल में समाने लगे हैं !

नज़र खुद से भी हम चुराने लगे हैं !

अंधेरों से लड़ने का था हौसला कम,

दिए कांपने थरथराने लगे हैं !

नए आफताबों की हो ख़ैर या रब,

उमर रात की ही बढ़ाने लगे हैं !

हवाओं में उसकी सदा यूँ घुली है,

कि हम खुद ब खुद गुनगुनाने लगे हैं ! 

हुई बेगुनाही अमल अहमकाना ,

कसम सब गुनाहों की खाने लगे हैं !

दिलों से दिलों की हुईं बंद राहें,

 नज़र दर नज़र कैदखाने लगे हैं !

वफ़ा का न जाने अब अंजाम क्या हो,

सभी बेवफा दिल लगाने लगे हैं !

लरजती है डर से हरेक शाखे गुलशन,

सुना है वो जूडे सजाने लगे हैं !

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