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कविता

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Hindi Poetry

कविता जो छिप जाती है के शब्दों कतारों में
कविता जो खोजती है अपनेआप को,
कटे घिसे अक्षरों के जंजालों में
कविता जो सिमट जाती है मुड़े फेंके कागजों ,
पुराने डायरियों या अखबारों में
कविता जो रह जाती है किसी की बातों
या पुरानी यादों में
कविता जो पाती है तारीफ लोगों की निगाहों में
कविता जो समेट लेती है वाक्यों को अपनी पनाहों में
कविता जो चल पड़ती है हमारे साथ जीवन की कठिन राहों में

6 Comments

  1. siddhanathsingh says:

    बहुत अच्छा प्रयास पल्लवी, थोडा शब्दों में वर्तनीगत गलतियाँ हैं,सब्दों की बजाय शब्दों होना चाहिए था ,दुन्द्ती की जगह ढूँढती ,निगाओं की जगह निगाहों कर दीजिये. मेरी दो पंक्तियाँ आप की कविता में खुद को ढूढने के ज़िक्र के सन्दर्भ में याद हो आयीं-
    हम परख कर हुए मायूस बहुत
    खुद से मिल कर हुए मायूस बहुत.

  2. prachi says:

    agree wid s.n sir,,plz do make d above said corrections but on d whole,,a lovely poem wid well chosen words..keep it up 🙂

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