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ख़बरों की मौत

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Hindi Poetry

क्या दुन्ढ़ते हैं हम,
हर सुबह अखबारों में
मौत का समाचार
औरत का बलात्कार
बसों की टक्कर
युवाओं के चक्कर
नेताओं के भाषण
गरीबों का शोषण
उत्कंठा और लाचारी
निराशा और बेरोज़गारी
क्यूँ है? पश्चिम का प्रभाव
अपनों में भारतीयता का आभाव
क्यूँ नहीं पाते हम ?
भारत का सुन्दर चित्र
दुश्मन भी हमारा मित्र
उदाशी में भी हो आशा
कुछ कर गुजरने की अभिलाषा
अपनी धरोहर अपनी संस्कृति
अपनी रीत रिवाज़ अपनी प्रगति
पुरुष की पौरुश्ता ,नारी का सलोना रूप
बुजुर्गों की छाव ऊँचे आदर्शों की धुप
अगर अखबार में यही है हमारी सहभागिता
तो छोड़ देनी चाहिए ऐसी पत्रकारिता

8 Comments

  1. rachana says:

    good one Pallawi, keep writing!

  2. U.M.Sahai says:

    बहुत अच्छी कविता, पल्लवी, keep writng and sharing.

  3. siddhanathsingh says:

    शायद औरों की प्रशंसा में किसी को कोई रूचि नहीं होती है.वाही गप्प गोष्ठी सफल और दीर्ग्जीवी होती है जिसमें आलोचना की जाती है,ठकुरसुहाती गानेवालों की बात बहुत ज़ल्दी बंद हो जाती है. अधिअकंश manushy ओं का स्वभाव ही बकौल श्री हरिशंकर परसाई सूअर जैसा होता है जो गन्दगी पर ही टूट पड़ना चाहता है. क्या कीजियेगा.

  4. sushil sarna says:

    रचना सुंदर है,भाव अच्छे हैं,वास्तविकता के करीब है लेकिन कुछ एडिटिंग की जरूरत है – प्रयास के लिए बधाई

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