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सपनों के पंख

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Hindi Poetry, Uncategorized

जिंदगी गुजरती गई ,और तु उजडती गई

सूखे पेड़ों के पत्तों की तरह, तु भी बिखरती गई
तुझसे ज्यादा खुशनसीब ये पत्ते थे, जो उड़ गये

तु भंवर थी ,सागर में ही उलझती गई

संकुचित मन था, संकुचित तन था

बस यहाँ भावनाओं का, आवागमन था

हारी थी हर पल ,बस खुद से लडती गई

पंख कभी फैलाए नहीं, बस सपनों में उडती गई

12 Comments

  1. U.M.Sahai says:

    बहुत सुंदर रचना, पल्लवी, बधाई.

  2. vpshukla says:

    achhi rachana ,bahut bahut badhaai.

  3. Vishvnand says:

    क्या बात है
    बात बड़ी गहन, अर्थपूर्ण और सुन्दर
    दर्शादी इन कुछ पंक्तियों के ही अन्दर
    अति मनभायी रचना पढ़कर …
    हार्दिक बधाई …..

  4. siddha Nath Singh says:

    ek simple si kavita jo aur rachav mangti hai. honhar birvaan ke cheekne patte ki tarah.

  5. काफी गहरा अर्थ ली हुई सुन्दर रचना …

  6. prachi says:

    वाकई बहुत गहरी रचना मन की गहराई तक पहुँचती हुई 🙂

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