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चाह

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Hindi Poetry

तुम्हारे साथ सिर्फ़ गीली संवेदनायें नहीं,
सुलगते विचार भी बाँटना चाहता हूँ.
प्रेम का कोमल, कुचला जा सकने वाला अहसास ही नहीं
बौद्धिकता का कठोर धरातल भी साझा करना चाहता हूँ.
और चाहता हूँ थोड़े हिसाब से खुद को खर्च करना
और चाहता हूँ खरीदना – तुम्हें किस्त दर किस्त.

और चाहता हूँ कि तुम ना दबो मेरी विशालता से
और चाहता हूँ कि तुम ना पिसो मेरी संकीर्णता से
और चाहता हूँ कि तुम मुझे ना चाहने को स्वतंत्र रहो
मेरी ग्रंथियाँ हमारी ना बने – की अथक कोशिश चाहता हूँ
और चाहता हूँ कि लहलहाये तुम्हारे अंदर – स्वाभिमान,
जिसके एक अंश पर मेरा नाम लिखा हो.

11 Comments

  1. prachi says:

    i thoroughly loved it vikash,,aisa lagta hai jaise tumne mere andar ke hi vichaar kavita me bun diye hai..superb work dear 🙂

  2. ashwini kumar goswami says:

    अत्युत्तम प्रेमभावपूर्ण रचना, क्या कहना ! पञ्च-सितारा अभिव्यक्ति !

  3. siddha Nath Singh says:

    बहुत अच्छी कविता लगी.

  4. Prem Kumar Shriwastav says:

    वाकई बहुत बहुत सुन्दर रचना…बहुत बहुत शुभकामनाये…

  5. pallawi says:

    और चाहता हूँ खरीदना – तुम्हें किस्त दर किस्त
    bohut bhavbhari kavita!!!

  6. c k goswami says:

    aapki chaah me gahrayee hai athaah———chahat ho to aisee.

  7. Vishvnand says:

    कविता तो बहुत सुन्दर है,
    भाव भी बहुत अच्छे और गहन हैं,
    पर न जाने क्यूँ मुझे ये रचना कुछ खटकी भी.
    पूरी कविता में कवि सिर्फ वह क्या चाहता है इसका ही बयान है
    पर कहीं भी वो क्या चाहती हो इसे जानने की जिज्ञासा नजर नहीं आती
    ” मै चाहता हूँ, की आप क्या चाहती हैं ये मैं समझ पाऊँ ”
    बस ऐसे ही कुछ विचार मन में उभरे ….

  8. Priyal says:

    ab vishwas hua

  9. vmjain says:

    गहन भावों से परिपूर्ण रचना अच्छी लगी.

  10. Radhika says:

    this is so YOU!:D! the art…of seamlessly blending the light with the heavy..of being..yet NOT being! Vikashji….unbeatable!:P!

  11. Mudit says:

    vikash you express something which resides inside me 🙂

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