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आबरू

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Anthology 2013 Entries, Hindi Poetry

दो आँसूं इधर लुढके थे, एक चीख उधर गूंजी थी

फिर इज्जर के रखवालों ने, आबरू किसी की लूटी थी

सीसे सा दिल, पत्थर में बदल गया

अपराधियों के कोर्ट, में गवाह फिर मुकर गया

वो बेवफा सामने खड़ा, खिल्लियाँ उड़ा रहा

बदचलनी के कितने ही, इल्जाम वो लगा रहा

छिप गयी दरवाजे के पीछे, बेआवाज रो रही

जिंदगी से भली, मौत उसको लग रही

14 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत सटीक, ह्रदय हिला देने वाली,
    आजकल की दुर्व्यवस्था और घिनौने शर्मनाक हालात बताती हुई,
    सत्य उजागर करती हुई अर्थपूर्ण प्रभावी रचना,
    Kudos to you for penning the poem the way you have done.

    कुछ हिंदी शब्दों की त्रुटियाँ सुधारने की जरूरत है

  2. vpshukla says:

    विश्व जी से मैं सहमत हू!

  3. छिप गयी दरवाजे के पीछे, बेआवाज रो रही. bahut badhiya sentiments hai aapki is kavita main. आज कल के परिवेश का ज्वलंत सत्य नजर आ रहा है.

  4. rachana says:

    Hi Pallawi,

    good attempt…keep writing!

  5. Ravi Rajbhar says:

    very nice… 🙂

  6. dr.paliwal says:

    ACHCHHI RACHNA……
    MAIN BHI SIRJI(VISHv Ji) SE SAHMAT HUN……

  7. Aditya ! says:

    दिल को तार तार कर गयी आपकी कविता… बहुत सुन्दर और संवेदनशील ….

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