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Beauty / sundarta

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विश्व सुंदरी
काले कजरारे नयनो ….. नागिन सी लटो….
पतली कमर ….और पल्लवी ओठ ……
नागिन सी चाल…… गर्वोन्नत मस्तक…..को
कहा जब सुन्दर ….
अपनी नादानी पर तरस बहुत आया था…..
सुन्दर तो वह थी जिसने……….
गिरे हुए को उठाया था……….
अश्रुपूरित हो गले से लगाया था……
आँचल से धूल पोंछी थी ……
औ’ लब से घाव धोया था…..
फिर एक दिन डूबते को बचाया था…..
धौंकती छाती से सांसो को पिलाया था……..
मरियल हांथो के झूले में अस्पताल
पहुँचाया था……..
सूनी आँखों से रतजगा किया और,
भर-भर हांथो अर्थ भी लुटाया था…….
हाँ वही थी सबसे सुन्दर! सुंदरी…..विश्व ….सुंदरी..!!

सुधा गोयल

8 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत सुन्दर, बहुत अर्थपूर्ण,
    आजकल का माहौल देख कर लगता है की मानव की सुन्दरता के बारे में मानसिकता में बहुत बदलाव की जरूरत है. यह विदेशी परिभाषा का बहुत अनुकरण कर चुकी है जो काफी गलत है और असली उन्नति के लिए अनुचित.
    ये रचना सुन्दर तरह की सुधारक है.
    रचना की जितनी प्रशंसा करें कम है.
    हार्दिक बधाई
    hardik Badhaaii.

  2. ~HIRAL~ says:

    its really amazing poem maam ,,,,,, wish to write such a good one….. 🙂

  3. Sangeeta Mundhra says:

    asli sundarta ka sateek sundar varnana. atishay sundar!

  4. medhini says:

    Sunder kavitha, Sudha.
    Pasand ho gayi.

  5. सुधा जी, सुंदरता के सही मायने आपने रचना के माध्यम से बताये है. इस विषय मैं एक मेरे गीत का मुखड़ा याद आता है:-
    सुंदरता तेरे मन की देखी, देखा नहीं मैंने ये यौवन.
    प्रेम तेरा गंगा जल जैसा, कितना निर्मल,कितना पावन.
    एक बार फिर बहुत बहुत साधुवाद.
    .

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