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dhoop ka ek tukada

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धूप का एक टुकड़ा

मेरी खिड़की से झांकता धूप का एक टुकड़ा , नटखट मुस्काता ,
कभी इधर कभी उधर , मुझसे आँख मिचौली करता है,
हर नए दिन की शुरुआत पर और नटखट होता जाता है,
मेरी मुट्ठी की पकड़ से बाहर, कितना दौड़ता है,
चुलबुला, शरीर, हंसमुख, खिलाडी, मेरे लालन जैसा,
हाँ बिल्कुल मेरे लालन जैसा……………….
कितना किलकता, मचलता और हँसता, फिर
मेरी झांझर के शोर को अपना न समझ ,
सहम जाता, निशब्द हो जाता,और दौड़कर
मेरे ही आँचल में छुपता फिर भाग जाता………..
बहुत खिजाता, बहुत मनवाता……..
छुप गया एक दिन धूप के टुकड़े सा बादलों में
सिंगापुर…अमरीका….या कनाडा की गलियों में………..

सुधा गोयल ‘नवीन’

7 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत सुन्दर रचना और अंत का गहन मोड़.
    बहुत मनभावन लेखा है,
    जिसे बार बार पढ़ने जी चाहता है.
    हार्दिक बधाई

  2. siddha Nath Singh says:

    रूपक और विम्ब विधान बेजोड़ है सुधा जी.

  3. siddha Nath Singh says:

    विम्ब विधान और रूपक बेजोड़ है सुधा जी.

  4. prachi says:

    अंत वाकई बेहद मर्मस्पर्शी 🙂

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