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सपने

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Hindi Poetry

देखे थे हमने भी कुछ सपने
चाहा था हों कभी ये भी अपने
मन से इन्हें लगाये बैठे थे हम
हर गम अपना भुलाये बैठे थे हम
एक पल में ये क्या हुआ
संजोये बैठे थे जिन्हें लाड़ से
संभाल रखा थे जिन्हें प्यार से
रेत की तरह हाथ से छूट गये
कांच की तरह गिरकर टूट गये
भूल गये थे हम न जाने क्यूँ
सपने तो बस
आँखों में अच्छे लगते हैं
ये झूट मूठ के सच्चे लगते हैं
सपने कभी नहीं होते अपने
सपने तो हैं आखिर बस सपने .

7 Comments

  1. ankur says:

    bahut achi kavita hai

  2. Vishvnand says:

    बहुत खूब, बहुत अच्छे, मनभावन
    बधाई
    सही कहा है,
    अपने सपने भी नही होते अपने,
    वो कहीं चले जाते हैं दिखाकर सपने,
    फिर भी हम छोडते नहीं देखने सपने,
    और कहते रहते इन्हें “अपने” सपने

    • Neha maya says:

      @Vishvnand, कविता को पसंद करने और इस काव्यात्मक कमेन्ट के लिए बहुत धन्यवाद्, विश्व जी .

  3. siddha nath singh says:

    वाह क्या लयात्मकता और भावों की सांद्रता है. बधाई हो .

  4. Reetesh Sabr says:

    संभाल रखा थे जिन्हें प्यार से
    रेट की तरह हाथ से छूट गये
    कांच की तरह गिरकर टूट गये

    नेहा जी, ‘रेट’ को बस ‘रेत’ कर दीजिये, अर्थ दिशाविहीन न होंगे.
    शेष तो सुन्दर लिखा है.

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