बिखरे रंग
डर लगता है कभी कभी
धड़कन भी बढ जाती है
डर चुपके से कुछ कह जाता है
फिर से कुछ लम्हों को चुरा ले जाता है
अपने आगोश में उन्हें लेकर,
बेरंग कर हमको लौटाता है
ये बेरंग हैं इसके – अरमान आंसू बन के न बह जाएँ
सपने कांच के जैसे टूट के न बिखर जाएँ
साये भी कहीं मुझे छोड़ कर न चले जाएँ
वक़्त ही कहीं ढहर न जाये …………………..
रंगों की तलाश में इस बार
मैं वक़्त से कुछ आगे चल चुका हूँ
पकड़ लूँगा मैं रंगों को
कसकर अपनी मुठ्ठी में
बिखेर दूंगा इन्हें -
होली के रंग के जैसे ” वक़्त की राहों में “


बहुत सुन्दर कल्पना.
कविता भी अच्छी लगी.
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