अजब दोस्त एक आज हमको मिला है
मुसलसल सवालों का एक सिलसिला है
अजब दोस्त एक आज हमको मिला है
उसे सिर्फ मुझसे शिकायत नहीं है
अपितु इस शहर में सभी से गिला है !
नहीं खुरदुरे लफ्ज़ लाना लबों पर
कहोगे तुम्ही कल हलक़ क्यूँ छिला है !
बहुत आ रहे तुम हो नज़दीक मेरे
बढ़ा क्या दिलों में अधिक फासला है !
10 Comments
खूबसूरत ग़ज़ल से ये चेहरा खिला है
क्या सुंदर कविताओं का सिलसिला है.
महकी है आब-ओ-हवा ज़िन्दगी की
इन्हीं कोशिशों से ये उपवन खिला है.
bahut बढ़िया ग़ज़ल, तरनूम मैं.
siddhanathsingh Reply:
February 9th, 2010 at 2:48 pm
@vikas yashkirti, थैंक्स ख़ुशी है की आप को रचना पसंद आई.
बहुत सुन्दर रचना, हार्दिक बधाई
vikas yashkirti jii ने जैसा लिखा है,
वही ख्याल मेरे भी दिल में खिला है …..
एक अच्छी कविता, एस. एन.
पर सिर्फ चिकने लफ्ज़ ही ज़ुबां पर जो लाओगे तो
कहोगे तुम ही बार-बार कि ये लफ्ज़ तो ज़ुबां से फिसला है
A nice sweet poem, Sidhanath.
siddhanathsingh Reply:
February 10th, 2010 at 1:07 pm
@medhini, Thanks, you enjoyed it that is my reward.

akhiri sher tuk me nahi hai.achhi kavita ya ghazal jo bhi sahi.
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siddhanathsingh Reply:
February 9th, 2010 at 2:47 pm
@vpshukla, जी हाँ इसे मैं फासिला लिख सकता था किन्तु हिंदी में उपयोग हो रहे उच्चारण को ध्यान में रख इतनी लिबर्टी ली गयी है. थैंक्स.
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