बदन के पोर अब भी रात भर अपने दहकते हैं !
उदासी से बुझे चेहरे ख़ुशी की राह तकते हैं !
तबस्सुम के कदम भी इस तरफ आते झिझकते हैं !
बदलने थे चले दुनिया की रस्मे पुर सितम हम भी,
हमीं हारे, सितमगर के न लेकिन हाथ थकते हैं !
किये जाते हैं तकरीरें वो रह रह इन्किलाबों की
उन्हें समझाइए कोई, हमारे कान पकते हैं !
ये आलम है, मिलीं जब से तेरी आँखों से हैं आँखें
तमाम आलम में तेरे रूप के जलवे झलकते हैं !
कभी जो प्यार से उसने हमारे हाथ चूमे थे,
हुए ये संदली तब से, हमेशा ही महकते हैं !
बसी है धडकनों में यों तुम्हारी सांस की गर्मी
बदन के पोर अब भी रात भर अपने दहकते हैं !
5 Comments
बहुत खूब और बढ़िया, मज़ा आ गया.
है कितनी खूबसूरत नज़्म में इस बात ही ऐसी,
कि पढ़कर दिल हमारे भी धड़क कर गुदगुदाते हैं …
siddhanathsingh Reply:
February 9th, 2010 at 11:38 am
@Vishvnand, Thanks. it should have been like this-
है कितनी खूबसूरत, नज़्म में इस बात है ऐसी,
कि पढ़कर दिल हमारे गुदगुदाते से धड़कते हैं …
Vishvnand Reply:
February 9th, 2010 at 11:47 am
@siddhanathsingh
This is my comment and not a poem and I wanted to say & mean
कि पढ़कर दिल हमारे भी धड़क कर गुदगुदाते हैं …
and is not the same in placement and meaning as
कि पढ़कर दिल हमारे गुदगुदाते से धड़कते हैं …
There is a subtle and important difference between the two.
siddhanathsingh Reply:
February 10th, 2010 at 10:08 am
@Vishvnand, I just tried to fit in the rhyme Sir. Thanks.

achhi kavita.keep it up.
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