Quick Links: English Poetry | Hindi Poetry | Poetry Podcasts | Editor's Pick | Forum
Email This Poem |
« »

प्रेम अनोखा

कृष्ण है इक प्रेम का सागर
राधा है उसकी लहर
जब जब कृष्ण की बंसी बाजे
राधा क्यूँ जाती ठहर
कृष्ण की बंसी में ऐसा क्या
जो राधा मन भावे
ये तो है बस प्रेम अनोखा
जो सबके मन को मोहे

मीरा यूँ दीवानी होकर
बजाती है क्यूँ इकतारा
क्यूँ सबसे बेगानी होकर
भूल गई जग सारा
शाम की मूरत में ऐसा क्या
जो मीरा मन सोहे
ये तो है बस प्रेम अनोखा
जो सबके मन को मोहे

यूँ ही इस प्रेम में खोकर
चलते जाएँ हम तुम भी
बहता जाये जीवन यूँ ही
जैसे प्रेम रस की धारा
धारा में है ऐसा क्या
जो इक दूजे की बाट को जोहे
ये तो है बस प्रेम अनोखा
जो सबके मन को मोहे

5 Comments

बहुत मीठी अर्थपूर्ण रचना है,
बड़ी मनभावन
बात बहुत सुच है ऐसा अनोखा प्रेम ही सब के मन को मोहे है,
और जो दिखावा आजकल के प्रेम का है वो दिल को दुःख ही देवे है …

Comment on this comment

Jeewa Reply:

@Vishvnand, इस काव्यात्मक comment के लिए शुक्रिया विश्व जी .

Comment on this comment

Neha Reply:

@Vishvnand, धन्यवाद विश्व जी

Comment on this comment

सरल शब्द संयोजन और बात में वज़न, क्या सुखद संयोग है!.

Comment on this comment

Neha Reply:

@siddhanathsingh, धन्यवाद सिद्धांत जी

Comment on this comment

Leave a comment

(required)

(required)

(Press Ctrl+G to toggle between English & Chosen Indian language)