दर्द
दर्द से हमारे वे यूँ तिलमिलाए बैठे हैं
के जैसे चोट हमे लगी ज़ख्म वे खाए बैठे है
दर्द सहने की पड़ गई है आदत सी हमको
जाने दर्द कैसे से हम सीने में छुपाये बैठे हैं
काश बता पाते हम दर्द अपने उनको
काश दिखा पाते हम ज़ख्म अपने उनको
हाल-ए-दिल सुनाने का जब भी करता है दिल उनको
तो देखते हैं की वे तो मुंह फुलाए बैठे हैं
काश वे मज़बूरी हमारी समझ पाते
दर्दों से यारी हमारी समझ पाते
हम तो है शाख के वो उल्लू
जो गैरों के लिए खुद को भुलाये बैठे हैं
न समझेंगे वे और न हम समझा पाएंगे
मिला था दीवाना कोई एक हमारे जैसा
मिलकर गैरों से वे ये भूल जायेंगे
नहीं करेंगे गिला इसका भी कोई उनसे
हम दिल को अपने ये समझाए बैठे हैं
6 Comments
रचना अच्छी और मनभावन लगी. बधाई
मुहब्बत में खुशी चखने के इंतज़ार में,
चोट ही खाए बैठे हैं,
और हम कविता रच इक अलग सी
खुशी का अहसास आजमा रहे हैं
Jeewa Reply:
February 9th, 2010 at 7:48 pm
@Vishvnand, आपकी रचनात्मकता बहुत मनभावन लगी विश्व जी , धन्यवाद
शाख का उल्लू गैरों के लिए खुद को भुला देता है ऐसा दृष्टान्त अब तक तो कहीं नहीं पढ़ा .उपमा कुछ जमी नहीं. शायद आप काठ का उल्लू कहना चाह रहे होंगे जो संज्ञा शून्य होता है.
Jeewa Reply:
February 9th, 2010 at 7:49 pm
@siddhanathsingh, शाख का हो या काठ का, है तो उल्लू ही न सिद्धांत जी, हाहा, वैसे आपका ये तर्क बहुत अच्छा लगा, धन्यवाद सिद्धांत जी

“हम तो है शाख के वो उल्लू
जो गैरों के लिए खुद को भुलाये बैठे हैं”
Very Good, Jeewa-Ji. Likhte raho!
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Jeewa Reply:
February 9th, 2010 at 7:46 pm
@Milind, dhnyawad milind ji
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