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प्रेम अनोखा

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Hindi Poetry

कृष्ण है इक प्रेम का सागर
राधा है उसकी लहर
जब जब कृष्ण की बंसी बाजे
राधा क्यूँ जाती ठहर
कृष्ण की बंसी में ऐसा क्या
जो राधा मन भावे
ये तो है बस प्रेम अनोखा
जो सबके मन को मोहे

मीरा यूँ दीवानी होकर
बजाती है क्यूँ इकतारा
क्यूँ सबसे बेगानी होकर
भूल गई जग सारा
शाम की मूरत में ऐसा क्या
जो मीरा मन सोहे
ये तो है बस प्रेम अनोखा
जो सबके मन को मोहे

यूँ ही इस प्रेम में खोकर
चलते जाएँ हम तुम भी
बहता जाये जीवन यूँ ही
जैसे प्रेम रस की धारा
धारा में है ऐसा क्या
जो इक दूजे की बाट को जोहे
ये तो है बस प्रेम अनोखा
जो सबके मन को मोहे

5 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत मीठी अर्थपूर्ण रचना है,
    बड़ी मनभावन
    बात बहुत सुच है ऐसा अनोखा प्रेम ही सब के मन को मोहे है,
    और जो दिखावा आजकल के प्रेम का है वो दिल को दुःख ही देवे है …

  2. siddhanathsingh says:

    सरल शब्द संयोजन और बात में वज़न, क्या सुखद संयोग है!.

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