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चाय और शक्कर में अब पड़ने लगी दरार…………..
चाय और शक्कर में अब पड़ने लगी दरार,
ज्योतिषी मैं नहीं कहकर करते आ”प वार”,
“माया व ती’व्र महंगाई का कैसे बिठाये मेल, (माया=धन)
गरीब जनता को छलने क्यों खेल रहे है खेल,
‘शरद’ ने बसंत ऋतूराज पर ऐसी छाप छोड़ी,
आम आदमी ने पहले ‘शक्कर’ अब ‘दाल’ खानी छोड़ी,
बोला ‘मन’ ‘मोहन’ तुम कुछ करिष्मा दिखाओ,
द्रौपदी बचायी दुशासन से देश को महंगाई से बचाओ,
कैसा आया वक़्त कैसे दिन देखने मिल रहे,
राशन गायब घरों से और चूल्हे नहीं जल रहे,
हम तो कहते अब वह कहावत बदलनी होगी,
“घर की मुर्गी दाल बराबर” की जगह,
‘घर की दाल बाहर की मुर्गी बराबर’ करनी होगी……..
16 Comments
अच्छी मजेदार रचना है..सत्यता को व्यंग्मय डंग से प्रस्तुत करने की एक सुन्दर कोशिस
“घर की मुर्गी दाल बराबर” की जगह,
‘घर की दाल बाहर की मुर्गी बराबर’ करनी होगी……..
Bahut sunder…maja agya sir…
वाह! मायावती का मायावी प्रयोग या शरद का वारम्बार संताप !
वाह डॉ साहब क्या बात है,
ऐसी डाइग्नोसिस और इलाज, रचना द्वारा करने में आपका हाथ कोई नहीं पकड़ सकता. आप supreme specialist हैं ये मेरा मानना है,
सुन्दर कल्पना लिए इस व्यंग रचना को पढ़ने का मजा ही कुछ और है.
इस रचना को share करने के लिए हार्दिक धन्यवाद और बधाई भी.
ख्याल आया, की शायद ” यहाँ दाल नहीं गलती ” के बदले अब ” यहाँ दाल नहीं मिलती ” कहना ज्यादा उचित हो.
dr.paliwal Reply:
February 5th, 2010 at 11:11 am
@Vishvnand,
Sirji aapki itni achchhi pratikriya se main gadgad ho gaya ji…..
क्या अंदाज और शैली है योगेश जी, मजा आ गया.

मैं बहुत बड़े सपने देख कर, उन्हें पुरा करने में बहुत बड़ी कोशिश करके आए, अति अल्प परिणामों से भी
बहुत संतुष्ट होनेवाला, विदर्भ के एक छोटेसे गाँव "इटखेडा" से हूँ, जो नक्शल प्रभावित इलाकों में से एक है, जहाँ के लोगों ने आज़ादी के 50 साल बाद पहली बार "सड़क" देखि. 1973 में इसी गाँव में मेरा जन्म हुआ, माँ मुझे सबसे प्यारी है, पिताजी की शालीनता बहुत भाती है, भाईके गुस्से से डरता हूँ, भतीजों से बहुत प्यार करता हूँ, पत्नी का प्यार जीने की आस है. जलगांव मेरी कर्मभूमि है.
तत्कालीन राष्ट्रपति आदरणीय "डॉ. APJ अब्दुल कलामजी" से काफी प्रभावित हूँ, एक कवि का मन रखने वाले "अटलजी" अच्छे लगते है, "स्व. बाबा आमटे" और उनके बेटे "विकास और प्रकाश आमटे" का कार्य देखने के बाद, समाज कार्य का जूनून मुझपर संवार हो गया. जहाँ किसी प्रकार के वाहन नहीं जातें, ऐसी जगहों पर जाकर भी मैंने मरीजों का मुफ़्त में इलाज किया है. उसीकी वजह से लगता है मेरा धरती पर आना सफल हो गया.
कभी कभी जब मै बहुत दुखी या बहुत खुश होता हूँ, बन जाती है कोई शायरी, या कविता, या गीत.
माया शरद और मन मोहन का प्रयोग भा गया.
सुधा गोयल
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dr.paliwal Reply:
February 5th, 2010 at 11:07 am
@sudha goel,
Bahut Bahut Dhanyvad ……
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