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चाय और शक्कर में अब पड़ने लगी दरार…………..

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Hindi Poetry

चाय और शक्कर में अब पड़ने लगी दरार,
ज्योतिषी मैं नहीं कहकर करते आ”प वार”,
“माया व ती’व्र महंगाई का कैसे बिठाये मेल, (माया=धन)
गरीब जनता को छलने क्यों खेल रहे है खेल,
‘शरद’ ने बसंत ऋतूराज पर ऐसी छाप छोड़ी,
आम आदमी ने पहले ‘शक्कर’ अब ‘दाल’ खानी छोड़ी,
बोला ‘मन’ ‘मोहन’ तुम कुछ करिष्मा दिखाओ,
द्रौपदी बचायी दुशासन से देश को महंगाई से बचाओ,
कैसा आया वक़्त कैसे दिन देखने मिल रहे,
राशन गायब घरों से और चूल्हे नहीं जल रहे,
हम तो कहते अब वह कहावत बदलनी होगी,
“घर की मुर्गी दाल बराबर” की जगह,
‘घर की दाल बाहर की मुर्गी बराबर’ करनी होगी……..

16 Comments

  1. sudha goel says:

    माया शरद और मन मोहन का प्रयोग भा गया.
    सुधा गोयल

  2. अच्छी मजेदार रचना है..सत्यता को व्यंग्मय डंग से प्रस्तुत करने की एक सुन्दर कोशिस

  3. Ravi Rajbhar says:

    “घर की मुर्गी दाल बराबर” की जगह,
    ‘घर की दाल बाहर की मुर्गी बराबर’ करनी होगी……..
    Bahut sunder…maja agya sir… 🙂

  4. Neha says:

    बहुत बढ़िया .. शब्दों का प्रयोग मन को भा गया. रवि जी के comment से पूर्ण सहमती .

  5. siddha Nath Singh says:

    वाह! मायावती का मायावी प्रयोग या शरद का वारम्बार संताप !

  6. Vishvnand says:

    वाह डॉ साहब क्या बात है,
    ऐसी डाइग्नोसिस और इलाज, रचना द्वारा करने में आपका हाथ कोई नहीं पकड़ सकता. आप supreme specialist हैं ये मेरा मानना है,
    सुन्दर कल्पना लिए इस व्यंग रचना को पढ़ने का मजा ही कुछ और है.
    इस रचना को share करने के लिए हार्दिक धन्यवाद और बधाई भी.
    ख्याल आया, की शायद ” यहाँ दाल नहीं गलती ” के बदले अब ” यहाँ दाल नहीं मिलती ” कहना ज्यादा उचित हो.

  7. Reetesh Sabr says:

    लाजवाब अदा

  8. Raj says:

    क्या अंदाज और शैली है योगेश जी, मजा आ गया.

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