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“भिक्षा-वृत्ति”

“भिक्षा-वृत्ति”
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कहता वह किस किस को, जिस जिस को वह कहता है,
कोई सुने या नहीं सुने, वह तो कहता रहता है !
जाता है वह कहाँ कहाँ, वह जहां जहां जाता है,
कुछ न कुछ ले आता है, जब वापस आता है !

जीवन की चक्की को वह इसी तरह चलाता है,
क्या क्या कठिनाई आती है, वह येन केन भुलाता है !
कई बार जब कुछ नहिं मिलता, खाली हाथ चला आता,
केवल तब ही  उसको, हे परमेश्वर क्यों याद आता ?

अब वह असमर्थ हो रहl, वृद्धावस्था के कारण,
नहीं समझ पा रहा जीवन का होगा कैसे niवारण ?
अब ही क्यों पछतावा आया, क्यों पहले नहिं याद किया,
उसने उस परमेश्वर को, जिसने hee मानव-जन्म दिया ?

जब वह था समर्थ सबल तब, क्यों न परिश्रम किया कभी,
भिक्षा-वृत्ति क्यों अपनाई, क्यों समझा न इसे तभी ?
कार्यहीनता स्वतः दिखाती कैसा कड़वा फल उसका,
दुष्परिणाम आ धमक बैठता, दोष यहाँ होता किसका ?

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8 Comments

भिक्षा-वृत्ति कर्यहीनता की द्योतक नहीं है
यह परमेश्वर को प्राप्त करने हेतु अहम् को मिटा देने की शुरुआत है
शैलेश

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ashwini kumar goswami Reply:

@Shailesh Mohan Sahai, I hoe you
may revisit the poem and try to decipher its gist. Thanks.

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बहुत सुन्दर रचना , और अर्थपूर्ण सन्देश/उपदेश .
इस स्तुत्य रचना के लिए हार्दिक बधाई
शैलेश जी आप जिस वृति की बात कर रहें हैं वो ये भिक्षा-वृति नहीं है …

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ashwini kumar goswami Reply:

@Vishvnand, Hearty thanks Dear Sir!

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Bahut Badhiya Rachna hai sirji…..
Badhai….

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ashwini kumar goswami Reply:

@dr.paliwal, Hearty thanks Dr, Sb.!

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हमारे समाज के एक बहुत संजीदा मुद्दे पर लिखी यह रचना बहुत सुन्दर लगी.

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ashwini kumar goswami Reply:

@Raj, Many many thanks Dear Raj!

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