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तुम हो मालामाल………
घर में मेरे चोरी करने,
आये कल दो डाकू,
माल निकालो कहने लगे वो,
गले पे रख के चाकू,
मैं फकीर मुझे लूटकर,
क्या ले जाओगे,
सारा घर छान मारो,
फूटी कवडी नहीं पाओगे,
फकीरी के हो दम भरते,
क्यों तिजोरी खाली नहीं करते,
हमें ना मिला कुछ तो,
इन्कमटैक्स वालोंको बताएँगे,
हम तो थोड़ेमे मानेंगे,
वह सब समेट ले जायेंगे,
झूठ बोलते, जानते है हम,
तुम हो मालामाल,
इस महंगाई में भी खरीद रहे थे,
कल तुम शक्कर और दाल………..
12 Comments
बहुत खूब ! महँगाई की मार को बहुत चुटीले अंदाज में बयाँ किया है आपने ! रचना के लिए बधाई और ध्न्यवाद !!
बहुत मार्मिक और हार्दिक रचना
पढ़कर जो कर देती हर दिल को मालामाल ,
कहाँ छुपा कर रखते हैं डॉ साहब, आप
कवित्व और मर्म का ऐसा सुन्दर माल ,
आप सच में हैं बहुत मालामाल ….
dr.paliwal Reply:
January 23rd, 2010 at 11:08 am
@Vishvnand,
Aapki is sundar pratikriya se main sachmuch malamal ho gaya sirji…..
Dhanyvad…..
बहुत khub …
बिलकुल सकी कटाक्श महंगाई और सरकारी तंत्र को….

मैं बहुत बड़े सपने देख कर, उन्हें पुरा करने में बहुत बड़ी कोशिश करके आए, अति अल्प परिणामों से भी
बहुत संतुष्ट होनेवाला, विदर्भ के एक छोटेसे गाँव "इटखेडा" से हूँ, जो नक्शल प्रभावित इलाकों में से एक है, जहाँ के लोगों ने आज़ादी के 50 साल बाद पहली बार "सड़क" देखि. 1973 में इसी गाँव में मेरा जन्म हुआ, माँ मुझे सबसे प्यारी है, पिताजी की शालीनता बहुत भाती है, भाईके गुस्से से डरता हूँ, भतीजों से बहुत प्यार करता हूँ, पत्नी का प्यार जीने की आस है. जलगांव मेरी कर्मभूमि है.
तत्कालीन राष्ट्रपति आदरणीय "डॉ. APJ अब्दुल कलामजी" से काफी प्रभावित हूँ, एक कवि का मन रखने वाले "अटलजी" अच्छे लगते है, "स्व. बाबा आमटे" और उनके बेटे "विकास और प्रकाश आमटे" का कार्य देखने के बाद, समाज कार्य का जूनून मुझपर संवार हो गया. जहाँ किसी प्रकार के वाहन नहीं जातें, ऐसी जगहों पर जाकर भी मैंने मरीजों का मुफ़्त में इलाज किया है. उसीकी वजह से लगता है मेरा धरती पर आना सफल हो गया.
कभी कभी जब मै बहुत दुखी या बहुत खुश होता हूँ, बन जाती है कोई शायरी, या कविता, या गीत.
very nice thought.
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dr.paliwal Reply:
January 22nd, 2010 at 2:02 pm
@Neha,
Thank U Very Much…….
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