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गुल

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Hindi Poetry

चलते रहे उम्र भर हम तो
काँटों भरी राहों पर
एक गुल क्या मिला
के हमे उसकी आदत हो गयी
उसकी चाहत हमारे लिए
इबादत हो गयी
अब इस दिल को
न चैन है, न आराम है
उस गुल के बिना कटती
न सुबह ,न शाम है
अब कहते हैं के बिछड़ना है
तुम्हे उस गुल से
वो क्या जाने के
उससे हमारी साँसे जुड़ गई
फिर सोचती हूँ …..
गुलों से इतना लगाव
अच्छा नहीं होता
गुलों ने तो हमेशा
खिलना नहीं होता
इससे तो अच्छी है
अपनी काँटों भरी राह
कम से कम काँटों को
मुरझाने का खौफ तो नहीं होता

8 Comments

  1. vmjain says:

    “कम से कम काँटों को
    मुरझाने का खौफ तो नहीं होता”
    अच्छा लगा. बधाई.

  2. dr.paliwal says:

    कम से कम काँटों को
    मुरझाने का खौफ तो नहीं होता….

    क्या बात कही है…
    बहुत खूब, बहुत सुन्दर……

  3. prachi says:

    कम से कम काँटों को
    मुरझाने का खौफ तो नहीं होता….hmm,lines 4m mughal-e-azam 🙂 achchi kalpana

  4. Vishvnand says:

    क्या बात है, कविता में नेह और माया दोनों ,
    आपने तो निम्न लाइनों में, मानो जीवन को गुल की उपमा देकर जीने का तथ्य ही है बताया…
    “गुलों से इतना लगाव
    अच्छा नहीं होता
    गुलों ने तो हमेशा
    खिलना नहीं होता”
    रचना बहुत अर्थपूर्ण और बहुत मन भायी,
    हार्दिक बधाई …

    • Neha says:

      @Vishvnand, आपके इन सुंदर और दिल को छू जाने वाले comments के लिए बहुत बहुत धन्यवाद् vishvnand ji

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